प्रयागराज, जेएनएन। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं की झूंसी न्याय नगर में भी संगोष्ठी हुई। इसमें पत्रकारिता एवं जन संचार के शोधार्थी पोस्ट डॉक्टोरियल फेलो डॉ. संतोष प्रधान भी मौजूद रहे। उन्‍होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार के मन में स्वाधीनता के लिए तीव्र छटपटाहट थी। हालांकि उस समय प्रचलित नारे और कुछ सस्ते उपाय उन्हें विचलित करते थे। बोले कि राष्‍ट्रवादी आंदालन में भाग लेने वाले मुस्लिमों से आरएसएस के बेहतर संबंध हैं। 

बोले, मुस्लिमों को डॉ. हेडगेवार ने आगे बढ़कर गले लगाया

डॉ. संतोष प्रधान ने कहा कि स्‍वतंत्रता आंदोलन में उन दिनों हिंदू मुस्लिम भाई-भाई और हिंदू मुस्लिम एकता बिना स्वराज नहीं आएगा जैसे नारे आम थे। कांग्रेस को बस यही चिंता खाए जा रही थी कि किसी प्रकार मुस्लिम उसके पक्ष में रहें। वह तुष्टीकरण के लिए भी तैयार थी। हालांकि आजादी जैसे बड़े लक्ष्य के लिए तमाम चीजें करनी विवशता भी थी। उस समय ऐसी बातों का मुखर विरोध भी ठीक नहीं था। अंग्रेज उसका लाभ लेते। बाद में राष्ट्रवादी शिविर लगाया गया। उसमें शामिल होने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों को डॉ. हेडगेवार ने आगे बढ़कर गले लगाया। हां वह चेतावनी भी देते थे कि अनुचित मनुहार किसी का भी न किया जाए। 

संगठित हिंदू समाज ही राष्ट्र को दे सकता है मजबूती

परिचर्चा में शामिल विहिप के गोरक्षा प्रांत के लालमणि तिवारी ने कहा कि आरएसएस अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने व संजोने के लिए बना है। इसमें राष्ट्रीय भाव कूट-कूट कर भरा है। मुस्लिम समुदाय का व्यक्ति यदि राष्ट्रीयता से ओतप्रोत है तो वह स्वयं ही इस संगठन का हिस्सा बन जाता है। डॉ. हेडगेवार का मानना था कि हिंदू समाज संगठित और सशक्त रहेगा तो देश अपने आपन मजबूत होगा। हमारी संस्कृति भी फूले फलेगी। उस पर किसी भी आक्रांता की नजर नहीं पड़ेगी। मुस्लिम समुदाय के लोगों को संघ से अलग करने का भी कुचक्र कुछ लोगों ने रचा। आखिर राष्ट्रवाद का विरोध क्यों। भारती संस्कृति का विरोध क्यों। हम सब के लिए सब से पहले राष्ट्र। संघ की यही अवधारणा है। इसे ही मूर्त रूप देने का प्रयास संगठन के स्थापना काल से किया जा रहा है।

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