प्रयागराज, जेएनएन। कोविड आइसीयू में जब पहली बार ड्यूटी की थी तो मन बहुत घबराया हुआ था। कहीं मरीज से खुद भी न संक्रमित हो जाऊं, मुझे कुछ हो गया तो....। उधर पिता जी भी मना कर रहे थे, कहते थे कि बेटा सरकारी नौकरी छोड़ दो, लेकिन मेरा मन नहीं माना। जब एमबीबीएस की डिग्री ली थी तभी ठान चुका था कि मेरे हाथ से किसी गंभीर मरीज के जीवन की रक्षा हो जाएगी तो समझूंगा कि अपना जीवन सफल हो गया। यह कहना है मोतीलाल नेहरू मेडिकल काॅलेज के डाॅ. देवेंद्र शुक्ला का।

...मन से कोरोना का डर ही आउट हो गया

डाॅ. देवेंद्र शुक्ला की पत्नी महिमा शुक्ला भी डाक्टर हैं। उन्‍होंने बताया कि जब उनकी कोविड आइसीयू में ड्यूटी लगी तो उन्होंने मजबूत मानसिकता से सपोर्ट किया। फिर तो मन से जैसे कोरोना का डर ही आउट हो गया। जितनी बार कोविड आइसीयू में ड्यूटी मिली, पूरी तन्मयता के साथ उसे निभाया। एक बात सच है कि डाक्टर अगर मरीज या किसी बीमारी से घबराएगा तो बीमारी से ग्रसित लोगों की तकलीफ दूर करने कौन आएगा।

रही बात घर की तो अस्पताल से घर जाने पर पूरी तरह सैनिटाइज होकर ही भीतर जाते हैं। सबसे पहले वाशरूम दिखता है। वहीं कपड़े चेंज करते हैं और स्नान करके अपने सेपरेट कमरे में पहुंचते हैं।

ड्यूटी लेवेल थ्री कोविड अस्पताल में बतौर इंचार्ज लगी है

उन्‍होंने बताया कि उनका बेटा रिजु शुक्ला और बेटी शताक्षी छोटे हैं। हालांकि उनमें भी कोरोना वायरस को लेकर समझदारी आ गई है। सावधानी बरतते हुए बच्चों के साथ खाना खाते हैं और खेलते भी हैं। बेटा रिजु जब कहता है कि पापा अपने कमरे में जाकर सो जाइए तो लगता है कि अब तो बच्चे भी पापा के फर्ज में पूरा सपोर्ट कर रहे हैं। बताया कि उन्‍हाेंने कोरोना की वैक्सीन लगवा ली है। अब उनकी ड्यूटी लेवेल थ्री कोविड अस्पताल में रजिस्ट्रेशन ऑफिस सिंगल विंडो में बतौर इंचार्ज लगी है।

Edited By: Brijesh Srivastava