प्रयागराज, जेएनएन। त्वरित न्याय प्रक्रिया पर सरकार का विशेष जोर है। यह बात और है कि न्यायाधीशों की कमी त्वरित न्याय प्रक्रिया में सबसे बड़ा रोड़ा बन रही है। एशिया के सबसे बड़े इलाहाबाद हाई कोर्ट को ही लें तो यहां जजों के 54 पद खाली हैं। इससे जजों पर काम का बोझ बढ़ रहा है और एक जज को रोज 50 से लेकर 400 मुकदमे सुनने पड़ते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के 160 पद स्वीकृत हैं। इसमें 77 पद स्थायी व बाकी अस्थायी हैं, लेकिन इस समय सिर्फ 106 जज ही कार्यरत हैं। अगले साल तक 24 न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो जाएंगे। इससे स्थिति और खराब हो जाएगी। मार्च 2015 में हाई कोर्ट की कोलेजियम ने 11 वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नाम सुप्रीम कोर्ट व केंद्र सरकार को भेजे थे। इसमें से मात्र छह की न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति हुई। वह भी दो किस्तों में तीन नवंबर 2016 व तीन फरवरी 2017 को।

इसके बाद अप्रैल 2016 में 29 अधिवक्ताओं के नाम भेजे गए, जिसमें से सितंबर 2017 में केवल 19 ही न्यायाधीश नियुक्त हुए। फरवरी 2018 में 33 अधिवक्ताओं के नाम भेजे गए है, जिसमें आधे नियुक्त हुए। जजोंं की कमी के चलते हाई कोर्ट में मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस समय नौ लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं।

दस गुना अधिक न्यायाधीशों की जरूरत

चांसलर बीएचयू व न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) गिरिधर मालवीय ने कहा कि जनसंख्या व मुकदमों के अनुपात में हाई कोर्ट में स्वीकृत पदों से दस गुना अधिक न्यायाधीशों कीजरूरत है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राधाकांत ओझा ने कहा कि हाई कोर्ट में अच्छे न्यायाधीशों की नियुक्ति होनी चाहिए। पद खाली होने से मुकदमे लंबित हो रहे हैं, जिससे याचियों को दिक्कत होती है।

जनता को ज्यादा दिक्कत

पूर्व चेयरमैन यूपी विधि आयोग व न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रवींद्र सिंह का कहना है कि न्यायाधीशों की कमी से हाई कोर्ट वर्षों से जूझ रहा है। इससे जनता को ज्यादा दिक्कत होती है। इसलिए खाली पद भरने चाहिए। यूपी बार कौंसिल के अध्यक्ष हरिशंकर सिंह ने कहा कि न्यायाधीशों की कमी से न्याय प्रक्रिया बाधित हो रही है। जनहित में न्यायाधीशों के खाली पदों को जल्दी भरना चाहिए।

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