प्रयागराज, जेएनएन। गंगा नदी पर झूंसी में निर्मित शास्त्री ब्रिज, केवल तीर्थराज प्रयाग को बाबा भोलेनाथ की नगरी वाराणसी से ही नहीं जोड़ता है बल्कि प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के लिए भी आवागमन का महत्वपूर्ण सेतु है। इससे होकर गुजरने वाली ग्रांड ट्रंक रोड बिहार प्रांत और पश्चिम बंगाल को भी प्रयागराज से जोडऩे का काम करती है।

लाल बहादुर शास्त्री के नाम गंगा नदी पर रखी गई थी पुल की नींव

लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता अजय गोयल के मुताबिक वर्ष 1966-67 के आसपास इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में गंगा नदी पर वाराणसी जाने वाले मार्ग पर पुल की नींव रखी गई थी। बाद में इस पुल को पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का नाम दे दिया गया।

कोलकाता की जोशी एंड कंपनी को मिला था निर्माण का जिम्मा

प्रयागराज शहर और झूंसी के बीच गंगा नदी पर बने पुल के निर्माण का जिम्मा तब कोलकाता की निजी निर्माण इकाई जोशी एंड कंपनी को दिया गया था। पीडब्ल्यूडी के अवर अभियंता यशवंत सिंह ने बताया कि उस वक्त किसी बड़े पुल का निर्माण करना बहुत ही मुश्किल हुआ करता था। कुछ खास निजी कंपनियां ही पुल निर्माण का काम करती थीं जिसके चलते जोशी एंड कंपनी को गंगा पर पुल निर्माण का काम सौंपा गया लेकिन सात साल काम करने के बाद कंपनी पुल के निर्माण को अधूरा छोड़ कर चली गई।

ब्रिज कारपोरेशन ऑफ इंडिया ने पूरा किया पुल का अधूरा काम

नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआइ) के स्थानीय प्रोजेक्ट मैनेजर एके राय के मुताबिक केंद्र सरकार ने साल 1973 में ब्रिज कारपोरेशन ऑफ इंडिया का गठन किया, इसी दौरान झूंसी में गंगा पर बन रहे पुल का काम अधर में लटक गया तो सरकार ने गंगा पुल के शेष काम को पूरा करने की जिम्मेदारी ब्रिज कारपोरेशन को सौंप दी।

काम पूरा होने पर वर्ष 1980 में शास्त्री ब्रिज से शुरू हुआ यातायात

ब्रिज कारपोरेशन ऑफ इंडिया ने ब्रिज का निर्माण वर्ष 1980 में पूरा कर लिया जिसके बाद पुल को नेशनल हाइवे अथॉरिटी आफ इंडिया को सौंप दिया गया। जिसके बाद से पुल टोल प्लाजा आदि की स्थापना की गई और फिर पुल से आवागमन आरंभ हुआ।

एनएचएआइ ने 30 साल तक निभाई पुल के रखरखाव की जिम्मेदारी

शास्त्री पुल की देखरेख, मरम्मत और सुरक्षा की जिम्मेदारी तकरीबन 30 साल तक एनएचएआइ ने ही निभाई। इस बीच पुल से गुजरने वाले वाहनों से टोल टैक्स भी वसूला जाता रहा। 26 जुलाई 2010 को पुल की सुरक्षा व रखरखाव की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग को सौंप दी गई थी। यशवंत सिंह ने बताया कि पुल के मेंटीनेंस पर विभाग की ओर से लगातार ध्यान दिया जाता है। महाकुंभ 2013 के पूर्व लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपये से पुल को संवारा गया था। इस दौरान पुल की सड़क और रेलिंग की मरम्मत कराने के साथ प्रकाश प्रबंधन को बेहतर किया गया था।

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