जागरण संवाददाता, इलाहाबाद : नवीनता के साथ पुरातन का अटूट संबंध होता है। आज मुद्रण व प्रकाशन के क्षेत्र में जो काम हो रहा है, उसकी नींव सौ साल पहले बाबू चिंतामणि घोष ने रखी। उन्होंने इस क्षेत्र में अविस्मरणीय कार्य किए, सरस्वती व बालसखा जैसी कालजयी पत्रिकाएं उसकी गवाह हैं। यह बातें पूर्व मंत्री डॉ. नरेंद्र कुमार सिंह गौर ने कहीं। वह रविवार को बाबू चिंतामणि घोष की 162 वीं जयंती पर पं. देवीदत्त शुक्ल व पं. रमादत्त शुक्ल शोध संस्थान की ओर से इंडियन प्रेस परिसर में आयोजित गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। कहा कि इंडियन प्रेस से प्रकाशित होने वाली पत्रिका सरस्वती व बालसखा के यशस्वी संपादकों आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबू पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवीदत्त शुक्ल ने समाज में साहित्य, ज्ञान व विज्ञान का सर्जन किया।

¨हदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री विभूति मिश्र ने कहा कि प्रकाशन के क्षेत्र में बाबू चिंतामणि घोष ने क्रांति लाने का काम किया था। दुर्भाग्यवश आज वैसी स्थिति नहीं है। समय के साथ यह बदलाव कैसे आया इस पर चिंतन की जरूरत है। चंडी पत्रिका के संपादक ऋतशील शर्मा ने बाबू चिंतामणि घोष व अपने पितामह देवीदत्त शुक्ल के भावनात्मक प्रगाढ़ संबंधों से जुड़े संस्मरण सुनाए। भाषाविद् डॉ. पृथ्वीनाथ पांडेय ने कहा कि अ¨हदी भाषी होते हुए भी बाबू चिंतामणि ने अंग्रेजी शासन में इंडियन प्रेस की स्थापना कर राष्ट्र प्रेम का परिचय दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता राघवेंद्र प्रसाद मिश्र ने इंडियन प्रेस के साथ अपने पिता ठाकुरदत्त मिश्र के संबंधों की यादें ताजा की। इस दौरान बंगाल कला के वयोवृद्ध चित्रकार भवानीशंकर सेन गुप्त को सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया गया। संचालन बजरंगबली गिरि, आभार सुप्रतीक घोष ने ज्ञापित किया। कार्यक्रम में आलोक चतुर्वेदी, चंद्रप्रकाश, कुतंक मिश्र, प्रबोध मानस, बिजेंद्रनाथ पांडेय, वेदप्रकाश पांडेय, अंजनी सिंह, अनिल कनौजिया, दीपक सिंह, विनोद सिंह आदि मौजूद थे।