जागरण संवाददाता, इलाहाबाद : धार्मिक-सांस्कृतिक नगरी प्रयाग में हिंदी साहित्य का क्रमबद्ध इतिहास पं. बालकृष्ण भट्ट के समय आरंभ हुआ। अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते हुए पं. भट्ट ने प्रयाग में हिंदी की नींव डालकर उसे संरक्षित किया। उन्होंने हिंदी पत्रिका 'प्रदीप' के जरिए अंग्रेज सरकार से खुलकर मोर्चा लिया, साथ ही आम जनमानस के अंदर व्याप्त भय को दूर करते हुए उन्हें हिंदी से जोड़ने की मुहिम छेड़ी। इसी के चलते भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद पं. भट्ट को हिंदी का दूसरा प्रवर्तक कहा जाने लगा। हिंदी प्रदीप में नाटक, उपन्यास, समाचार और निबंध सभी छपते थे। लड़कियों को शिक्षित करने के लिए गौरी पाठशाला नामक विद्यालय की स्थापना में उन्होंने अहम भूमिका अदा की।

अहियापुर (मालवीय नगर) में खेमामाई मंदिर के समीप 23 जून 1844 को बड़े व्यापारी वेणी प्रसाद के घर जन्में पं. बालकृष्ण भट्ट बचपन से जुझारू प्रवृत्ति के थे। दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की। कायस्थ पाठशाला में वह संस्कृत के अध्यापक भी रहे। अंग्रेजी, उर्दू भाषा में उनकी गहरी पकड़ थी। हिंदी साहित्य सेवा का व्रत लेकर उन्होंने 1877 में सितंबर माह में हिंदी पत्रिका 'प्रदीप' की शुरुआत की। मकसद हर व्यक्ति के अंदर राष्ट्रप्रेम व भारतीयता की भावना को जागृत करना रहा। भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, महामना मदन मोहन मालवीय, श्रीधर पाठक, बाबू बालमुकुंद गुप्त, किशोरीलाल गोस्वामी, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबू गंगा प्रसाद गुप्त जैसे महारथी उनके पास आकर हिंदी की उन्नति और विकास की योजनाएं बनाते थे। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रामनरेश त्रिपाठी बताते हैं अंग्रेज सरकार ने नए पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन पर अंकुश लगा रखी थी। ऐसे में भट्ट जी समय-समय पर उसके शिकार होते रहे। परंतु कभी हार नहीं मानी, उन्होंने हिंदी प्रदीप के मुखपृष्ठ पर लिखा था ''शुभ सरस देश सनेह पूरित, प्रगट होए आनंद भरै बलि दुसह दुर्जन वायु सो मनिदीप समथिर नहिं टरै। सूझै विवेक विचार उन्नति कुमति सब या मे जरै, हिंदी प्रदीप प्रकाश मूरख तादि भारत तम हरै।।'' हिंदी प्रदीप में बहुत ही खरी बातें प्रकाशित होती थी। 1909 अप्रैल के चौथे अंक में माधव शुक्ल ने 'बम क्या है' नामक कविता लिखी। जो अंग्रेज सरकार को नागवार लगी और उन्होंने पत्रिका पर तीन हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। उस समय भट्ट जी के पास भोजन तक के पैसे नहीं थे, जमानत कहां से भरते। विवश होकर उन्हें पत्रिका बंद करनी पड़ी। 20 जुलाई 1914 को उनका निधन हो गया।

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नए लेखकों का अभ्युदय

पं. बालकृष्ण भट्ट की पत्रिका प्रदीप से कई लेखकों का अभ्युदय हुआ। इनमें राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, आगम शरण, पंडित माधव शुक्ल, मदन मोहन शुक्ल, परसन और श्रीधर पाठक आदि थे। इनके अतिरिक्त बाबू रतन चंद्र, सावित्री देवी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, जगदंबा प्रसाद उनके प्रभाव में थे। पुरुषोत्तम दास टंडन की प्रदीप में 12 रचनाएं प्रकाशित हुई। जो उन्होंने 1899 से लेकर 1905 के बीच लिखी थी। साहित्यकार अरविंद मालवीय बताते हैं टंडन जी के विचारों एवं भाषा शैली पर भट्ट जी का प्रभाव था। भट्ट जी ने 1877 में हिंदी नाट्य समिति की स्थापना की, जिसमें पंडित माधव शुक्ल, मुरलीधर शुक्ल, रास बिहारी शुक्ल, लक्ष्मीकांत भट्ट, महादेव भट्ट, सत्यानंद जोशी आदि सम्मिलित हुए थे। 1898 में सीता स्वयंवर एवं 1816 में महाभारत पूर्वाध की रचना की थी।

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भट्ट की प्रमुख कृतियां

पं. बालकृष्ण भट्ट ने निबंध, उपन्यास, नाटक में अपनी लेखनी चलाई। निबंध में साहित्य सुमन और भट्ट निबंधावली, उपन्यास नूतन ब्रह्मचारी तथा सौ अजान एक सुजान के अलावा नाटक में दमयंती, स्वयंवर, बाल विवाह, चंद्रसेन, रेल का विकट खेल आदि हैं।