अलीगढ़ : पिछले शुक्रवार तक सात बार रुपये में गिरावट देखी गई है। आजाद भारत में यह पहला मौका है, जब रुपया इतने नीचे गया हो। अर्थव्यवस्था के लिए यह बेहद चिंताजनक है। एक डॉलर के मुकाबले रुपया 72.50 पहुंच गया है। रिजर्व बैंक ने निजी बैंकों के जरिये बाजार में डॉलर की सप्लाई जरूर बढ़ाई, पर इससे बड़ी राहत नहीं मिलने वाली। इसके पीछे वैश्विक कारण तो हैं ही, देश में बेरोजगारी व औद्योगिक क्षेत्र में उछाल न आना भी है। डब्ल्यूटीओ को ट्रेड-वार में हस्तक्षेप करना चाहिए। सोमवार को दैनिक जागरण की अकादमिक बैठक में एएमयू के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. अशोक मित्तल ने गिरता रुपया कितना हानिकारक? विषय पर बेबाक राय दी। कहा, पेट्रोल-डीजल की कीमतों की उछाल ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जल्द ही माल भाड़ा व किराये में भी वृद्धि झेलनी पड़ सकती है।

मेहमान के बोल

विदेशी मुद्रा दो रूप में आती है। एक- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ), दो-विदेशी संस्थागत निवेश (एफआइआइ) यानी शेयर मार्केट से। हमारा औद्योगिक क्षेत्र में प्रदर्शन अच्छा नहीं है और कृषि मानसून पर निर्भर। सर्विस सेक्टर है, जो जीडीपी में इतना योगदान कर रहा है। पर, इससे रोजगार नहीं पैदा हो रहे।

विदेशी और खीचेंगे हाथ

डॉलर का रेट घटने से विदेशी निवेशक हाथ खींच रहे हैं। वजह यह कि औद्योगिक क्षेत्र बढ़ नहीं रहा और आगे बढ़ने के संकेत भी नहीं हैं। वहीं, डॉलर मंहगा होने से कैपिटल इन फ्लो की जगह कैपिटल आउट फ्लो होने लगा है। यानी, विदेशी मुद्रा आ कम, जा ज्यादा रही है। इसने डॉलर की मांग बढ़ाई। रुपया गिरने लगा। इससे निपट पाते कि कच्चा तेल महंगा होने लगा। हम खपत का 60 फीसद पेट्रोल-डीजल विदेश से लेते हैं, इसलिए हम पर असर भी ज्यादा पड़ा। इसका टूरिज्म पर भी असर होगा।

अमेरिका का दखल

अमेरिका ने भारत समेत कई देशों पर ईरान से तेल न लेने का दबाव बनाया है। कई पर बैन भी लगाया है। भारत सरकार ने बैन न लगाने को कहा है, लेकिन वह कहां तक माना, कुछ पता नहीं। इससे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। टर्की, ब्राजील, अर्जेटीना पर आर्थिक संकट मंडराने लगा है। अमेरिका व चीन को सद्बुद्धि आ जाए तो यह टैरिफ वार खत्म हो सकता है। डब्ल्यूटीओ को इसे रोकना चाहिए।

चुनाव का भी असर

सरकार ने स्किल इंडिया व मेक इन इंडिया को चलाया जरूर, पर ये सफल नहीं हुईं। सफल होतीं तो आज यह स्थिति न होती। औद्योगिक क्षेत्र आगे बढ़ता, रोजगार मिलता। आय बढ़ती तो एक्सपोर्ट बढ़ता। वित्त मंत्री बेशक कहें कि चिंता करने की बात नहीं, पर इसकी मार तो जनता पर ही पड़ेगी।

सवाल-जवाब

पेट्रोल की कीमतें देश में कम कैसे हों?

केंद्र और राज्य अपने टैक्स घटाकर राहत दे सकते हैं। आज मार्केट-लिंक से कीमतें बढ़ी हैं। जब कम थीं, तब सरकार कमाई में लगी हुई थी।

खपत घटाने के लिए क्या तेल की राशनिंग कारगर हो सकती है?

ऐसा करने से कुछ हद तक खपत जरूर घटेगी। इससे रुपये के मूल्य में गिरावट का असर भी

Posted By: Jagran