सुमित शर्मा अलीगढ़ । जिनकी खुद की जिंदगी अभी भले ही उलझी है, लेकिन रंग-बिरंगे धागे जब अंगुलियों से लिपटते हैं तो सुलझते हुए कभी खूबसूरत मेजपोश में तब्दील हो जाते हैं या कभी कागजों के थैलों पर फूल से खिले नजर आते हैं। मन में कहीं न कहीं अंधेरा जरूर है, लेकिन उनकी बनाई मोमबत्तियां बाहर की दुनिया को रोशन कर रही हैं। यह दुनिया जिला कारागार के अंदर की है, जहां महिला बंदियों के हुनरमंद हाथ रोज नई रचनात्मकता को छू रहे हैं और कीर्तिमान भी गढ़ रहे हैं।

बेरंग जिंदगी को ऐसे संभाल रहीं महिलाएं
जिला कारागार के अंदर की दुनिया भले ही बाहर से बेरंग और बेनूर नजर आती है, लेकिन फिलहाल स्थिति इससे अलग है। कई मामलों में सजा काट रहीं महिला बदियों को यहां अलग-अलग लघु-कुटीर उद्योगों से जोड़ा जाता है। इसी कड़ी में उन्हें छोटी-छोटी रचनात्मक वस्तुओं के निर्माण का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें कागज के बैग्स, मोमबत्ती व मैट बनाना, मेजपोश व डलिया बनाने जैसे काम शामिल हैं। इनकी बिक्री होने के साथ ही उन्हें सराहना भी मिल रही है। जेल प्रशासन और इनरव्हील क्लब की पहल से उठा यह कदम कैदियों को भी रास आ रहा है। वे पूरे मनोयोग से इसमें शामिल होती हैं और इसी के साथ अपनी सजा के बाकी दिन काट रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि आजाद होकर जब घर लौटेंगी तो नई जिंदगी की शुरुआत में समस्या नहीं आएगी।

150 बैग्स व 100 मोमबत्ती बनाईं
वरिष्ठ जेल अधीक्षक आलोक सिंह ने बताया कि जेल में अभी 120-125 महिला बंदी हैं। 31 जुलाई से छह अगस्त तक कार्यशाला लगाई गई थी। इसमें करीब 25 महिलाओं ने 150 पेपर बैग्स, 100 मोमबत्ती, 20 मेजपोश, 20 तकिये के कवर, ग्रीटिंग काड्र्स बनाए हैं। कार्यशाला के बाद भी महिला बंदी सामान बना रही हैं। कई बार ऑर्डर पर सामान बनाए जाते हैं।

आधे से ज्यादा सामान बिका
इनरव्हील क्लब से जुड़ीं तुलिका अग्र्रवाल बताती हैं कि चूंकि महिला बंदियों के काम में सफाई होती है। ऐसे में छह व सात अगस्त को सारसौल के पास लगाई गई स्टॉल में आधे से ज्यादा मोमबत्ती, पेपर बैग्स बिक गए। शेष सामान की बिक्री के लिए दीवाली मेला में फ्री स्टॉल लगाई जाएगी। महिलाओं को इसकी श्रम लागत भी दी जाती है। तुलिका के मुताबिक, महिला बंदियों के स्वभाव में पहले चिड़चिड़ापन था, लेकिन काउंसिलिंग के बाद खुद से ही रुचि दिखाने लगी हैं। इसमें आइडल पब्लिक आर्गनाइजेशन की मारिया आलम का सहयोग रहता है।

हुनर के हिसाब से उपलब्ध कराते हैं सामग्री
महिला बंदियों का जो हुनर होता है, उसी हिसाब से उन्हें सामग्री उपलब्ध कराकर सामान बनवाए जाते हैं, जिससे उनका खाली समय भी इस्तेमाल हो और कमाई भी कर सकें। वर्कशाप लगाकर उन्हें नई चीजें सिखाई जाती हैं, ताकि जब वो जेल से बाहर निकलें तो अपने जीवनयापन का जरिया बना सकें। प्रयास रहता है कि वेस्ट मैटीरियल या सस्ते सामान से चीजें बनाईं जाएं।

आकर्षक जेल मोमबत्ती व पेपर बैग
मोमबत्ती को गिलासनुमा आकार में बनाया गया है। गिलास में अंदर जैल, बजरी, मोती डालकर आकर्षक बनाया गया है। पेपर बैग्स को बनाने के लिए रद्दी, पुराने अखबार व काड्र्स, सूतली की रस्सी का प्रयोग किया गया है। खूबसूरत बनाने के लिए रंगों से डिजाइन की गई है।

महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर
वरिष्ठ जेल अधीक्षक आलोक सिंह का कहना है कि महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें, इसके लिए खाली समय में उन्हें रचनात्मक चीजें सिखाई जाती हैं। संस्थाओं के सहयोग से उनके हुनर को आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि जेल से छूटने के बाद आसानी से वे अपनी आजीविका का साधन बने सकें।

Posted By: Sandeep Saxena