अलीगढ़ : व्यस्तता के दौरान में तेजी से आगे बढ़ने की होड़ और भागदौड़ के बीच ऐसा बहुत कुछ हो जाता है, जिसके चलते आदमी के व्यवहार में भी बदलाव आता जाता है। बहुत कुछ पाने की चाहत में कुछ छूट भी जाता है। इसकी कमी एक समय के बाद महसूस होने लगती है। तब लगता है कि जो खो दिया, वह अब अपरिवर्तनीय है। यही सब समेटे हैं रणविजय ब्यूरोक्रेसी की पुस्तक 'दर्द मांजता है' में। इस संग्रह में विभिन्न परिवेशों से दस चुनी गई कहानिया हैं, जिनमें समय के साथ बदलाव और अनुभव हैं। लेखक रणविजय रेलवे में अधिकारी हैं। उनका अनुभव बहुत व्यापक है, जो इन कहानियों में झलकता है। उसके पास अपने व्यवसाय से, अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के बैक ग्राउंड से, ग्राम्य जीवन से तथा अपने मित्रों से मिली संपदा के रूप में अन्य व्यवसायों से जुड़ी हुई पूंजी है। संग्रह के आरंभ में लिखे दो शब्द में ही लेखक स्पष्ट करता है कि उसे बचपन से ही कहानिया पढ़ने का शौक रहा है। शुरुआत से ही वह कहानियों, उपन्यासों का दीवाना रहा है। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि लेखक एक इंजीनियर है और उसकी हिंदी की पृष्ठभूमि नहीं है, जो कुछ भी है वह उसके द्वारा मेहनत से अर्जित है। इसी मेहनत के बदौलत लेखक ने हिंदी साहित्य जैसे विषय से सिविल सर्विसेज की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। लेखक यह भी स्पष्ट करता है इस संग्रह में से आठ कहानिया 'वंचित 'और ' छद्म 'को छोड़कर बाकि कहानिया कई साल पहले लिखी गईं और दो कहानिया हाल में लिखी गई हैं। पुस्तक के अध्ययन से इन कहानियों में वह फर्क भी नजर आ जाता है। अनुभूत की गहनता, क्षिप्रता 'वंचित 'और छद्म में साफ़ दिखती है। लेखक अपनी तरफ से यह भी साफ कर देना चाहता है कि इन कहानियों में जो भी यथार्थपरकता लगती है, वह उसकी सहानुभूति हैं या दूसरों की अनुभूतियों को कुशल कलाकार की तरह उतारकर सामने रखने में हैं। पुस्तक की भूमिका प्रसिद्ध लेखक और रचनाकार तेज प्रताप नारायण ने लिखी है, जिनकी कई सफल कृतियां हिंदी वाग्मय में उपलब्ध हैं, जैसे 'कितने रंग जिंदगी के', 'टेक्निकल लव' एवं 'अपने-अपने एवरेस्ट '। तेज प्रताप लिखते हैं कि इन कहानियों में जीवन समग्र रूप से प्रतिबिंबित हुआ है, जिसमें महानगर की दौड़ -भाग, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम कर रहे लोगों की गला काट प्रतिस्पर्धा और आगे बढ़ने की इतनी चाहत की प्रमोशन के लिए अस्थाई प्रेम संबंध स्थापित कर लिए जाते हैं, से लेकर डेयरी उद्योग के माध्यम से गाव में क्रांति जैसी चीजें भी हैं।

कहानी संग्रह की प्रथम कहानी है 'वंचित'। यह कहानी अपने कलेवर में बिल्कुल आधुनिक है। इसका फलक लगभग 20 वर्ष के अंतराल पर फैला हुआ है और रचना स्तर पर यह एक संश्लिष्टता लिए हुए हैं, परंतु यह कहीं से भी जटिल नहीं है। कहानी अक्सर 20 वर्ष के समय में आगे पीछे चलती रहती है, परंतु पाठक को समझने में कहीं भी कठिनाई नहीं होती। कहानी का नायक विनीत अपने घर परिवार की उपेक्षा करके मानसी से प्रेम संबंध बनाता है, वहीं मानसी प्रोफेशन में आगे बढ़ने के लिए विनीत जैसी सीढ़ी का सहारा लेती है। यह कहानी कारपोरेट जगत की आज की वास्तविकता दर्शाती है, जहा शारीरिक संबंध भी निजी लाभ के लिए बना लिए जाते हैं। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे वैसे नायक को यह महसूस होने लगता है कि कुछ पाने के लिए उसने काफी कुछ खो भी दिया है और जो खोया है वह अब अपरिवर्तनीय है। कहानी संवादों से आगे बढ़ती है और अंत में एक ऐसे मोड़ पर रुक जाती है, जहा विनीत को अपनी जिंदगी में एक निर्वात सा लगता है। पाठक भी थोड़ी देर वहा रुक कर सोचने को मजबूर हो जाता है कि आगे क्या हुआ? उसकी जिज्ञासा बढ़ने लगती है। नायक के साथ उसको सहानुभूति भी होती है और घृणा भी होती है। मनोवैज्ञानिक दशाओं अंतर्मन में चलने वाले द्वंद्व का बहुत ही उत्कृष्ट मिश्रण इस कहानी में किया गया है।

संग्रह की दूसरी कहानी है 'मेरे भगवान', यह एक इनोसेंट(सरल) से भाव की कहानी है जो समाज में श्रेष्ठ मानव मूल्यों की स्थापना करती है। इसका नायक बंशी लाल एक भोला भाला गाव का इंसान है, जिसको थोड़ी सी आर्थिक सहायता और दिशा गाव के ही मास्टरजी देते हैं। इसके फलस्वरुप वह धीरे-धीरे अपनी गरीबी से उबर जाता है और एक समृद्ध आदमी बन जाता है, जो औरों को भी रोजगार देता है। कहानी कुल मिलाकर के इतनी सी है, लेकिन बहुत कोमल और थाम रखने वाली अंदाज में लिखी गई है। अवसान में आकर कहानी दिल को छू जाती है, जब बंशीलाल मास्टर जी से कहता है कि आपने जो ऋण दिया था, वह एक तरह से मेरे कार्य में निवेश है और जब तक इस निवेश से और पैसा बन रहा है, तब तक आप उसमें हिस्सेदार हैं। मास्टर जी के प्रेम और मार्गदर्शन को वह ईश्वर की छाया की तरह अपने ऊपर देखता है, जो वो हमेशा अपने ऊपर रखना चाहता है।

'कागजी इंसाफ' संक्षिप्त कहानी है। यह रेलवे, न्यायालय और ब्यूरोक्रेसी के बैकग्राउंड पर लिखी गई है। हमारे समाज की तमाम कुरीतियों में से नेतागिरी भी एक कुरीति है, जहा व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होकर, आत्म साधना में केवल नेतागिरी में लीन हो जाता है। ऐसे ही एक घटना में इसके परिणाम स्वरुप कुछ लोगों को रेलवे की नौकरी से निकाल दिया जाता है और फिर उनका जीवन संघर्ष शुरू होता है। वह न्यायालयों, तारीखों के कुचक्र में फंसते हैं और 10 साल तक घिसते रहते हैं। इसमें उनकी पूरी गृहस्थी टूट जाती है। इस कहानी का मुख्य चरित्र रामनरेश जब न्यायालय से न्याय का कागज लेकर वापस रेलवे जाता है तो वहा की उदासीनता और ब्यूरोक्रेसी की निर्ममता के चक्र में ऐसा फंसता है कि बिना नौकरी पर बहाल हुए मर जाता है, जिसके फलस्वरुप उसके आश्रितों को न तो नौकरी मिल पाती है और न ही पेंशन। इंसाफ केवल कागज पर होकर रह जाता है।

'दर्द मांजता है' संग्रह की चौथी कहानी है और यह किताब की शीर्षक कहानी भी है। यह एक मासूम कोमल प्यार की कहानी है, जिसमें कहानी का नायक क्षितिज एक इंजीनियर है और सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है। लातूर में भूकंप की विभीषिका होने पर, आत्मा की आवाज पर अपने मित्रों के साथ रेस्क्यू और रिहेबिलिटेशन के काम में सहायता करने के लिए चल देता है। कहानी की नायिका वंदना जो इस ट्रेजडी में अपने मा-बाप को खो चुकी है और लगभग टूट चुकी है उसे क्षितिज सहारा देता है। धीरे- धीरे उन दोनों में अनकहा प्रेम का बीज पनपता है। इस तरह क्षितिज वंदना को संभालता है। कहानी में भूकंप के दौरान किस तरह की क्रियाएं और राजकीय कार्य किए जाते हैं, उसके बारे में भी पाठकों को ज्ञान मिलता है। यह दिल को सहलाने वाली प्यारी सी कहानी है। इसमें फलक बहुत व्यापक है और अन्य पात्रों के बारे में लिखा जाता तो और बड़ी हो सकती थी। कहानी के विषय में और ट्रीटमेंट में अपार संभावनाएं हैं और इसमें एक नयापन भी है, जिसको लेकर एक फिल्म का निर्माण भी किया जा सकता है। 'परिस्थितिया' एक प्रयोगात्मक कहानी है। यह कहानी भाग-1, भाग-2 जैसे तरीके से लिखी गई है। शीर्षक दिखाता है कि इसमें परिस्थितियों का चित्रण होगा। यह एक दर्द से गुजरने की और उससे शिक्षा लेने की कहानी है। केंद्रीय चरित्र हरि प्रकाश शर्मा जो कि नौकरी पेशा व्यक्ति है एक दिन, पूरे दिन भर के काम की थकान के बाद में शाम को जब घर लौटता है, तब उसे मालूम चलता है कि उसका एक प्रिय संबंधी मृत हो गया है। वहा जाने और अगले दिन तक शव का दाह संस्कार का इंतजार करने के बीच में एक प्रताड़ना से वह और पूरा परिवार गुजरता है। ऐसी परिस्थिति को इसमें बहुत भावनात्मक अंदाज में दर्शाया गया है, जहा वह आपके दिल को बिना छुए नहीं गुजरेगा। लेखक ने बिंबों से वहा की दशा का वास्तविक चित्रण किया है, जो बिल्कुल आपके नजरों के सामने कहीं ना कहीं जरूर घटा होगा। एक परिस्थिति से गुजरने के बाद पुन: जब ऐसी परिस्थिति आती है तो हरि प्रकाश शर्मा उसको पहले से ही संभाल लेते हैं।

'ट्रेन, बस और लड़की' युवा वर्ग को गुदगुदाने वाली कहानी है। इसका आरंभ ही बहुत मौज भरा है- ट्रेन, बस और लड़की का इंतजार नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक जाती है तो दूसरी आती है। इंजीनियरिंग कॉलेज के चार दोस्तों के प्रेम में पड़ने, प्रेम में टूटने, फिर दोबारा प्रेम में पड़ने और तिरस्कृत होने की कहानी है। सबकी जिंदगी में ऐसे पल जरूर आते हैं, इसलिए यह कहानी बहुत जल्दी ही कनेक्ट हो जाती है। युवाओं में तो यह खासकर लोकप्रिय है। इसके वर्णन उनको कहीं-कहीं अपनी जिंदगी से लगते हैं।

'छद्म' बिल्कुल ही अलग भावों की एक संक्षिप्त कहानी है। कैसे एक व्यक्ति अपने सक्षम पिता की मदद से कानून व्यवस्था को चकमा देकर एक अन्य पहचान से अपने आप को इस देश में स्थापित कर लेता है, जिसके ऊपर पहले से ही बलात्कार जैसा एक संगीन आरोप चल रहा है, परंतु कहते हैं कि हर अपराधी चाहे जितना शातिर क्यों न हो, कोई न कोई लूप होल छोड़ जाता है। एक पारखी अधिकारी को शक हो जाता है और वह पूरा चक्र उल्टा चलाकर आखिर में अपराधी की पोल खोल देता है।

लेखक के अपने व्यवसाय से उठाई गई कहानी है 'राजकाज'। यह केवल रेलवे की नहीं, बल्कि हमारी शासन व्यवस्था के हर अंग में प्रासंगिक है। किसी ने बहुत माकूल कहा है- 'अकाल सबको प्रिय है'। कहने का पर्याय यह है कि जब अकाल होता है तो सरकार की तरफ से बहुत ढेर सारी आर्थिक सहायता आती है जो सभी अधिकारियों, कर्मचारियों को बिना बहुत ब्यौरा दिए हुए लोगों में बाटनी होती है। इससे लोग अपना घर भर लेते हैं। इस कहानी में भी कैसे किसी संकट को अपने लाभ के लिए मोड़ा जाता है, यह दर्शाया गया है। ब्यूरोक्रेसी की असंवेदनशीलता, चाटुकारिता कहानी में चरम पर दिखती है। रेलवे परिचालन के बारे में भी यह कुछ जानकारी पाठकों को देती है।

'एक तेरा ही साथ ' नारी विमर्श की कहानी है। जहा कहानी की केंद्रीय चरित्र एक नारी है, जिससे किसी और से विवाहेतर संबंध रखने की भूल हो जाती है। कहानी का जो नायक है, वह धीरे-धीरे यह महसूस करता है। उसे अपनी पत्‍‌नी से बहुत प्यार है और इतना प्यार है कि वह उसकी गलतियों को भी क्षमा करने को तैयार है। वह उसकी तमाम शक्तियों और सीमाओं के साथ ही स्वीकार करना चाहता है। आज के परिप्रेक्ष्य में यह हमारी सोच और दिशा को बदलने वाली कहानी है। जहा नारी को भी एक इंसान की तरह ही देखा जाना चाहिए।

कहानी संग्रह का आखरी शीर्षक है 'प्रतिशोध '.शुरू में यह कहानी पढ़ने में प्रेमचंद की किसी कहानी के वर्णन की याद दिलाती है। कहानी का कालखंड भी 1960-1980 है। जैसे-जैसे कहानी बढ़ती है, वैसे -वैसे आपको लगभग लगने लगता है कि इसमें क्या होने वाला है। जब तक कि आप अंत में नहीं पहुंच जाते, आखिरी पन्ने पर कहानी आपको चौंका देती है। इस कहानी का शिल्प पक्ष बहुत प्रभावी बना है। पढ़ते वक्त स्वत: एक आनंद की अनुभूति होती है। रणविजय की कहानियों में पाठक के लिए काफी ज्ञान भी छुपा है। यह एक ऐसा अंश है जो पाठक को मनोरंजन के साथ फ्री प्राप्त हुआ है। इसमें रेलवे, कॉर्पोरेट जगत का जीवन, बैंकों की कार्यशैली, भूकंप में रिहेबिलिटेशन ऑपरेशन, नौकरी इंटरव्यू की बारीकिया इत्यादि का सम्यक ज्ञानवर्धक ब्यौरा है।

भाषा के स्तर पर लेखक ने हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही तरह के शब्दों का प्रयोग किया है। अंग्रेजी को रोमन में ही लिख दिया गया है, जो कहीं-कहीं खटकता भी है। जिस तरह का परिवेश है, वैसी ही भाषा लेखक ने देने की कोशिश की है, जिससे कहीं से भी यह न लगे कि अरे यह पात्र ऐसे कैसे बोल सकते हैं? लेखक का कहानी लिखने का अपना एक अंदाज है जिसमें आखरी चंद लाइनों में वह बहुत कुछ कहता है। वहा आ कर के आप को घनीभूत अनुभव मिलते हैं जैसे एक वाक्य में सूक्ति जैसा लिख गया हो। कथ्य के आधार पर देखें तो सभी कहानियों में एक सशक्त कथ्य है और शिल्प के आधार पर भी उनमें एक नयापन है। कोई भी कहानी ऐसी नहीं लिखी जा सकती, जिसमें कहीं कथ्य का अभाव हो। किताब के आखरी पृष्ठ पर एक एक लाइन में सभी कहानियों का सार लिखा है जो एक अनूठा प्रयोग लगता है। पुस्तक के ग्राहकों को एक लाइन में इस तरह से बता देना, उनके लिए आसान कर देता है कि वे इस पुस्तक में रूचि रखें या नहीं। पुस्तक में कुल 112 पेज है और यह एक संक्षिप्त संग्रह है जोकि रुचिकर भी है।

Posted By: Jagran

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