अलीगढ़, जागरण संवाददाता। शरद पूर्णिमा की खीर शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। यह दावा है वैदिक ज्योतिष संस्थान के अध्यक्ष स्वामी पूर्णानंदपुरी महाराज का। उनका कहना है कि शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक रहता है। इस रात चंद्रमा की किरणों में औषधीय गुण की मात्रा सबसे अधिक होती है, जो मनुष्य को सभी प्रकार की बीमारियों से छुटकारा दिलाने में सहायक होती हैं। शरद पूर्णिमा की रात में खीर बनाकर उसे खुले आसमान के नीचे चांदी के बर्तन में रखकर अगले दिन प्रसाद के रूप में उसका सेवन करने से प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है। साथ ही सेहत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है

स्वामी पूर्णानंदपुरी ने कहा, वैसे तो प्रत्येक पूर्णिमा का हिंदू धर्म में महत्व होता है, लेकिन आश्विन मास की पूर्णिमा का लक्ष्मी और आरोग्यता प्राप्ति के लिए विशेष महत्व है। इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस दिन कोजागरी व्रत रखा जाता है, इसलिए इस पूर्णिमा को कोजगारी पूर्णिमा और कौमुदी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा के दिन महारास रचाया था। मान्यता है कि इस रात को चंद्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। इस दिन खीर बनाकर रातभर चांदनी में रखने की परंपरा है। सोमवार को शाम 07:03 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होगी और 20 अक्टूबर बुधवार की रात 08:20 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के चलते यह पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा।

चंद्रोदय के बाद किया जाता है पूजन

शरद पूर्णिमा के दिन पूजन चंद्रोदय के बाद किया जाता है। इस दिन पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 05:27 बजे से चंद्रोदय के बाद रहेगा। मान्यता के अनुसार इस दिन समुद्र मंथन के दौरान मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ गरूड़ पर बैठकर पृथ्वी लोक में आकर घर-घर जाकर भक्तों पर कृपा बरसाती हैं और वरदान देती हैं। मां लक्ष्मी की कृपा से रात्रि जागरण करने वाले लोगों को कर्ज से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि इसे कर्ज मुक्ति पूर्णिमा भी कहते हैं। इस रात को देखने के लिए समस्त देवतागण भी स्वर्ग से पृथ्वी पर आते हैं। उन्होंने कोजगारी पूजा के विधान की जानकारी देते हुए बताया कि नारद पुराण के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को सुबह स्नान कर उपवास रखना चाहिए। इस दिन पीतल, चांदी, तांबे या सोने से बनी लक्ष्मी प्रतिमा को कपड़े से ढंककर विभिन्न विधियों द्वारा पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात रात को चंद्र उदय होने पर घी के 11 दीपक जलाने चाहिए।

Edited By: Anil Kushwaha