प्रवीण तिवारी, छर्रा । भारतीय समाज में अधिकांशत: अपने सानिध्य में मां बच्चों का पालन पोषण करती है, वह अपनी संतान के हर सुख-दुख में भागीदार बनती है, जबकि पिता बागवान की तरह पूरे परिवार को अपनी छत्रछाया में रखकर उनका पालन पोषण करता है और बच्चों को काबिल बनाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देता है। उन्हैं मानसिक रूप से भी इतना मजबूत बनाना चाहता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वह प्रसन्न रहकर जीवन का आनंद उठा सकें। बच्चों के उज्जवल व सुखी भविष्य के सिवाय उसे कुछ दिखाई नहीं देता है। वह इसी ख्वाहिश में रहता है कि बेटा बड़ा होकर उसके बुढापे की मजबूत लाठी बनेगा और सहारा देगा। लेकिन अफसोस, ऐसे तमाम बरगद रूपी बुजुर्ग आज छांव को तरस रहे हैं। अपनी ही औलाद द्वारा दुत्कारने पर या तो दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं या किसी वृद्धाश्रम में आसरा पाकर जीवन काटने को मजबूर हैं। कस्बा छर्रा स्थित असर्फी ग्रामोद्योग संस्थान पर संचालित आवासीय वृद्धाश्रम पर अपनी अलग दुनिया बसाने वाले ऐसे ही कुछ बुजुर्गों से फादर्स डे पर जब उन्हैं टटोला गया तो उनकी आंखों से दर्द का समंदर उमड़ पड़ा। बच्चे मेरी उँगली थामे, धीरे धीरे चलते थे, फिर वो आगे दौड़ गए, मैं तन्हा पीछे छूट गया। वर्तमान आधुनिक समय में बच्चों की पूर्णतया बदली हुई जीवनशैली को देखकर बोझिल हो चुके बुजुर्ग जब अपने अतीत में झांकते हैं तो उन्हैं अपना त्याग व समर्पण नीरस लगने लगता है।

लोगों के कपड़े सिले लेकिन परिवार को न सिल सका

अतरौली तहसील के ग्राम भमसोई निवासी बुजुर्ग दौलीराम के तीन बेटा व एक बेटी है। बताते हैं कि जीवन भर दर्जी का काम करके बच्चों का पालन पोषण किया। पढा-लिखा कर काबिल बनाया। दिन रात लोगों के कपड़े सिलते हुए कडी मेहनत करके उनके शादी ब्याह किए। पांच साल पूर्व जब पत्नी का निधन हो गया तो बच्चों को बोझ लगने लगा। एक दिन दुत्कारते हुए घर से निकाल दिया। उसके बाद काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। किसी तरह वृद्धाश्रम में पनाह मिल गई। तब से वह यहीं रहकर जीवन गुजार रहे हैं।

पुरानीे यादों ने जख्‍मों का कर दिया हरा

गाजियाबाद के चमन विहार कालोनी निवासी बुजुर्ग नजीर अहमद की कहानी सुनने के लिए कुरेदा तो उनकी आंखें डबडबा आई। रुंधे गले से बताया कि शुरूआत में ईंट भट्ठा पर काम करके तीन बेटों का पालन पोषण किया। गुजारा नहीं चला तो काम छोड़कर हलवाई का काम किया। बेटों को पढाया लिखाया, कामयाब बनाकर उनकी शादी की। इसी में उनका सारा जीवन चला गया। करीब सात साल पहले पत्नी शकीला बेगम को पैरालाइसिस की शिकायत हुई तो काफी इलाज कराया। जो जमा पूंजी थी सब पत्नी के इलाज में खर्च हो गई। उसके बाद बच्चों ने घर से निकाल दिया। बीमार पत्नी को लेकर इधर उधर घूमते रहे। अलीगढ पहुंचे तो ढलती उम्र के चलते किसी ने काम नहीं दिया। जब वह काफी दुखी हो गए तो किसी की मदद से वृद्धाश्रम आ गए। यहां पर बुजुर्ग दंपती को सुकून मिल रहा है।

विकलांगता ने बदल दी जिंदगी

ग्राम मदापुर निवासी इंद्रजीत सिंह बताते हैं कि राजमिस्त्री का काम करते हुए तीन बेटों सहित परिवार का पालन पोषण किया। कडी मेहनत करते हुए बच्चों को पढाया लिखाया और पिता का फर्ज निभाते हुए बच्चों को काबिल बनाकर उनकी शादी ब्याह किए। फिर अचानक एक दिन राजमिस्त्री के काम के दौरान हादसे में उनका एक पैर खराब हो गया। और वह काम करने में असमर्थ हो गए। बच्चों को जब वह बोझिल लगने लगे तो किसी की मदद से वह वृद्धाश्रम पहुंच गए। कहते हैं कि यहां पर सभी सुविधाएं जरूर मिलती हैं, परंतु जिनके लिए जीवन भर मेहनत मजदूरी की। पीढा यही है कि आज उनकी किसी को परवाह नहीं है।

हम हर सुविधा देने का करते हैं प्रयास

वृद्धाश्रम संचालक एवं संस्था सचिव असर्फी लाल बताते हैं कि बुजुर्गों के जीवन में औलाद की कमी तो पूरी नहीं कर सकते, मगर आश्रम का पूरा स्टाफ उन्‍हें यहां पर हर सुविधा देने का प्रयास करता है। समाज कल्याण विभाग द्वारा आश्रम पर 150 वृद्धों के रहने की व्यवस्था है। वर्तमान में 90 वृद्ध रह रहे हैं। उनके नाश्ता-खाना, दवा, बिस्तर, कपडे आदि की सभी सुविधाएं विभाग द्वारा प्रदान कराई जाती हैं। 

Edited By: Anil Kushwaha