अलीगढ़ : सोशल मीडिया पर कई दिनों से मैसेज चल रहा है कि कांग्रेसियों को डीजल-पेट्रोल बढ़ी मूल्य वृद्धि दिखाई दे रही है, लेकिन भारत में रोहिंग्याओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है। बताते हैं कि रोहिंग्या से शुरू में दो सौ मुसलमान देवबंद आए थे, लेकिन वहां उन्हें अलीगढ़ में बसने की सलाह दी गई। इसके बाद से रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है। खुफिया आकड़ों के अनुसार 250 रोहिंग्या वर्क परमिट या शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। मगर मौके पर इनकी संख्या 500 से भी ज्यादा है।

खुफिया रिपोर्ट को लिया हल्के में

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लापता 893 रो¨हग्या मुसलमानों की केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट को स्थानीय जाच एजेंसियों ने हल्के से ही लिया। ये एजेंसिया पुराने रिकार्ड का ही हवाला देती रहीं, जबकि यहा आकर बसे रो¨हग्या की संख्या कहीं ज्यादा है। सर्वे रिपोर्ट में 63 परिवारों के 245 लोगों का जिक्त्र है, जबकि शहर के मकदूम नगर इलाके में ही 73 परिवारों में 312 लोग रह रहे हैं। बाकी 67 लोग कहा से आ बसे। असम पर छिड़ी बहस के बाद नए सिरे से सर्वे कराया जा रहा है। म्यामार, वर्मा से विस्थापित रो¨हग्या मुसलमानों में से करीब 40 हजार ¨हदुस्तान में हैं। इनमें 16 हजार शरणार्थी रूप में हैं। बाकी कहा हैं, कुछ पता नहीं। केंद्रीय खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 1200 रो¨हग्या हैं। इनमें से 307 की ही खबर है। बाकी 893 लापता हैं। पश्चिम उप्र में सर्वाधिक लापता अलीगढ़ (217) में बताए गए। केंद्रीय एजेंसियों ने स्थानीय प्रशासन से इनकी रिपोर्ट तलब की थी। जो रिपोर्ट यहा तैयार की गई है, उसमें 63 रो¨हग्या परिवारों के 245 लोगों का जिक्त्र है, जो शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। इन्हें यूनाइटेड नेशन हाई कमीशन ऑफ रिफ्यूजी द्वारा आइडी कार्ड दिए गए हैं। जबकि, इन लोगों का कहना है कि यहा 73 परिवारों में 312 महिला, पुरुष और बच्चे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी 67 लोग किसकी अनुमति से यहा बसे हुए हैं, ये कौन हैं? कहीं ये बंग्लादेशी तो नहीं हैं?

अलीगढ़ में 500 रो¨हग्याओं ने डाला था डेरा

2012 में म्यामार से 500 रो¨हग्या शरणार्थियों के रूप में यहा आकर बसे थे, इसके बाद इनकी संख्या 700 हो गई। इनमें ज्यादातर लोग मीट फैक्ट्रियों में मजदूरी करने लगे। बाकी लोग शहर के विभिन्न इलाकों में बस गए और मजदूरी करने लगे। जबकि, प्रशासनिक आकड़े कहते हैं कि शुरुआत में इनकी संख्या 271 थी। इनमें 26 लोग हैदराबाद जाकर बस गए। बाकी मीट फैक्ट्रियों के आसपास रहने लगे। वर्ष 2016 में रो¨हग्या, बाग्लादेशियों की संख्या पता करने के लिए यहा की सातों मीट फैक्ट्रियों में खोजबीन की गई थी। तब, जिला प्रशासन सटीक संख्या तय नहीं कर सका था। पर, बाग्लादेश, म्यामार व कुछ पाकिस्तान के मजदूरों के यहा कार्यरत होने की जानकारी मिली थी। इनके जो नाम-पते फैक्ट्रियों ने बताए, वहा जाने पर कोई नहीं मिला। पता चला कि बिना शरणार्थी कार्ड का नवीनीकरण कराए ही ये लोग यहा रह रहे थे।

मकदूम नगर में बसे हैं ज्यादातर

अलीगढ़ में 2010-12 के आसपास मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री में आए उछाल के बाद शहर में रोहिंग्या परिवारों का आना शुरू हुआ था। धीरे-धीरे मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के हब कहे जाने वाले मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखना शुरू कर दिया। अब तक मकदूम नगर में तकरीबन 300 से 400 लोग बस गए।

भुजपुरा व शाहजमाल में बढ़ रही संख्या

इसी तरह करीब एक-एक दर्जन परिवार भुजपुरा व शाहजमाल में भी हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। रोहिंग्याओं के अगुवा मो. बिलाल के अनुसार वर्तमान में 80 से 85 परिवारों में 400 से 500 लोग यहा हैं, जिनमें 300 बालिग रोहिंग्या शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट के सहारे हैं। बाकी 100 या उससे अधिक नाबालिग व बच्चे हैं, जिनका कार्ड नहीं होगा।

कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान

म्यामार में बौद्ध आबादी बहुसंख्यक हैं। इनमें करीब 11 लाख रोहिंग्या मुसलमान भी हैं। इनके बारे कहा जाता है कि ये मुख्य रूप से अवैध बाग्लादेशी प्रवासी हैं और ये कई सालों से वहा रह रहे हैं। म्यामार की सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया। पिछले पाच-छह सालों से वहा साप्रदायितक हिंसा देखने को मिली। इसके अलावा लाखों लोग बाग्लादेश में आ गए हैं। मौजूदा हालात यह हैं कि म्यामार में रोहिंग्या मुसलमानों को बड़े पैमाने पर भेदभाव और दुव्यवहार का सामना करना पड़ रहा है।

Posted By: Jagran