हिमांशु गुप्ता, हाथरस। हास्य सम्राट काका हाथरसी को तो आप जानते ही होंगे। याद आते ही न जाने कितनी उनकी कविताएं गुदगुदाने लगती हैं। पंक्तियों को गुनगुना कर ठहाके से बच नहीं पाते, लेकिन उनके बेटे लक्ष्मी नारायण गर्ग भी कम नहीं हैैं। देश में अलग पहचान बनाने वाले हाथरस के डॉ. गर्ग की सुर व सरगम पर करीब 150 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

संगीत समेत कई विधाओं के धनी

86 वर्षीय डॉ. गर्ग संगीत, चित्रकला समेत कई विधाओं के धनी हैं। उन्होंने पांच साल की उम्र से ही संगीत  सीखना शुरू कर दिया था। हाथरस के प्रसिद्ध तबला-वादक पंडित लोकमान व हरिप्रसाद शर्मा से तबला वादन सीखा। जयपुर के पंडित शशिमोहन भट्ट ने सितार-वादन में दीक्षित किया। 1954 में पंडित रविशंकर से संगीत सीखा। 1962 में मुंबई चले गए। वहां फिल्म व शास्त्रीय संगीत में अवसर भी मिला। 1966 से 1968 तक ऑल इंडिया रेडियो मुंबई के ऑडिशन बोर्ड के सदस्य रहे। 1984 में फीचर फिल्म 'जमुना किनारेÓ बनाई। हिंदी में पीएचडी डॉ. गर्ग ने कई राजघरानों से जुड़े सदस्यों को संगीत सिखाया। 70 के दशक में रीवा राजघराने के वंशज राजा मार्तंड्य सिंह की पत्नी प्रवीन कुमारी को संगीत सिखाया। जगन्नाथपुरी के राजा की वंशज, मुंबई के मशहूर पोद्दार हाउस, खाऊ हाउस, बजाज परिवार, बिड़ला परिवार के सदस्यों को गायन-वादन सिखाने उनके घर जाया करते थे।

संगीत से असाध्य रोगों का इलाज

डॉ. गर्ग संगीत के जरिये असाध्य रोगों का इलाज भी करते हैं। हाल ही में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'संगीत से रोग चिकित्साÓ में ध्वनि, स्वर व राग से तमाम बीमारियों के इलाज के बारे में बताया गया है। म्यूजिकथेरेपी, पिंडा उत्पत्ति, ध्वनि की उत्पत्ति, संगीत  चिकित्सीय प्रभाव, राग चिकित्सा, रोगों में स्वरों का प्रयोग, रोग चिकित्सा में संगीत का प्रभाव आदि की विस्तृत जानकारी दी गई है। इसकी भूमिका पतंजलि योगपीठ के अध्यक्ष स्वामी बालकृष्ण ने लिखी है।

ऐसे काम करती है राग चिकित्सा

डॉ. गर्ग के मुताबिक कान जब किसी ध्वनि से झंकृत होते हैं तो उनका कंपन्न सूक्ष्म स्नायु तंतुओं से मस्तिष्क को ध्वनि का बोध कराता है, जो कंपन्न नियमित और लगातार होते हैं। वे आनंददायक नाद का बोध कराते हैं। जब ये नाद बेतरतीब टकराते हैं तो शोर की संज्ञा के रूप में लगते हैं। संगीत को परमाणु ऊर्जा के रूप में जाना जाए तो चिकित्सीय क्षेत्र में बड़ा उपयोग हो सकता है। डॉ. गर्ग का कहना है कि चिकित्सा के तौर पर संगीत में अनुसंधान जारी रहना चाहिए, ताकि इसकी आंतरिक शक्ति का रहस्योद्घाटन हो सके। यह चिकित्सा इंसान ही नहीं, पेड़-पौधों पर भी प्रभावी है। तमिलनाडु के अन्नामलाई विश्वविद्यालय में किए गए शोध के मुताबिक एक पौधे को संगीत सुनाया गया तो उसकी वृद्धि उसी प्रजाति के दूसरे पौधे से डेढ़ गुना हुई। चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में संगीत चिकित्सा पद्धति शुरू हुई है। वहां प्रख्यात वादक एन राजम की वायलिन रिकॉर्डिंग सुनाकर मरीज का ऑपरेशन किया गया। उस मरीज को बेहोश करने या फिर कोई दवा की जरूरत नहीं पड़ी। डॉ. गर्ग बताते हैं कि संगीत से रोगों का इलाज महज काल्पनिक नहीं है। वे दावा करते हैं कि कई वर्ष पहले उन्होंने मुंबई में मानसिक रूप से कमजोर युवती व युवक को राग चिकित्सा से ठीक कर दिया था।

डॉ. गर्ग की चर्चित पुस्तकें

1954 में उनकी पहली किताब 'आवाज सुरीली कैसे करेंÓ लिखी थी।  1970 में 'कथक नृत्यÓ पुस्तक भी चर्चित रही। 2015 में 'भरतनाट्यमÓ पुस्तक ने खूब ख्याति बटोरी। 2017 व 2018 में उनकी संगीत शब्दकोष किताब के दो संस्करण आए। इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सम्मानित किया। 1934 में काका हाथरसी ने संगीत मासिक पत्रिका शुरू की, जिसकी बागडोर 1955 से डॉ. गर्ग ने संभाली। 2012 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की ओर से डॉ. गर्ग को टैगोर रत्न से सम्मानित किया गया।

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Posted By: Mukesh Chaturvedi