अलीगढ़, जागरण संवाददाता।  दादा-दादी का प्रेम माता-पिता से भी बढ़कर होता है, लेकिन टप्पल में दादा-दादी ने इस रिश्ते को शर्मसार कर दिया। अपनी पोती की उस उम्र में हत्या कर दी, जब वो अपने बचपन से निकलकर सपने देखने लगी थी। स्कूल जाते वक्त जब बच्ची को उसके दादा-दादी ने रोका तो शायद वह महसूस भी ना कर पाई होगी कि उसके साथ क्या होने वाला है? जैसा दादा-दादी कहते गए, वो करती गई और सिर्फ एक मुकदमे से बचने के लिए मासूम की बलि चढ़ा दी गई। जिसने भी इस घटना की कहानी सुनी, वह दंग रह गया। आखिर उस बच्ची का कसूर क्या था? क्या गला दबाने से पहले दादा-दादी के हाथ जरा भी नहीं कांपे? घटना तो पहले दिन खुल गई थी, लेकिन पुलिस ने संवेदनशीलता बरती और जुर्म को हत्यारोपितों के मुंह से उगलवानेे तक इंतजार किया। ऐसा करने में पुलिस को तीन दिन लगातार डटे रहने पड़ा।

सट्टे पर लगाम नहीं

सट्टा, जुआ और गांजा तस्करी...। ये वो गैरकानूनी अपराध हैं, जिन्हें रोकने की कवायद खूब होती है, पर कोई नतीजा नहीं निकलता। हालांकि, जिले में इन दिनों एंटी क्राइम हेल्पलाइन के जरिये ऐसे कई लोगों पर शिकंजा कसा जा चुका है, लेकिन अभी भी निचले स्तर पर हालात नहीं सुधरे हैं। गांधीपार्क और सासनीगेट थाना क्षेत्र के कई इलाकों में धड़ल्ले से सट्टा खेला जा रहा है। अंदर की बात है कि पुलिस को पूरी जानकारी होती है। एक सज्जन बताने लगे कि चौकी के अलावा लैपर्ड के लिए हफ्ता बंधा है तो कार्रवाई कैसे हो सकती है। कभी-कभार जब मामला ज्यादा तूल पकड़े तो दो-तीन गुर्गों को उठाकर जेल भेज दिया जाता है, लेकिन धंधा प्रभावित नहीं होता। ये काम इतने गोपनीय तरीके से होता है कि अधिकारियों को खबर ही नहीं लगती। अगर समाज को अच्छा माहौल उपलब्ध कराना है तो सट्टे के कारोबार पर लगाम लगानी होगी।

तो हालात संभाल सकते थे दारोगा...

पश्चिम बंगाल की पुलिस अलीगढ़ में पहली बार नहीं आई थी, लेकिन इस बार मामला इतना बिगड़ गया कि टीम से मारपीट तक हो गई। इसमें हर स्तर पर लापरवाही हुई। सबसे पहले टीम जब थाने पहुंची तो उच्चाधिकारियों को सूचना ही नहीं दी गई। बल्कि दूसरे क्षेत्र के दारोगा को टीम के साथ भेज दिया गया। दारोगा ने स्थिति को संभालने की बजाय और रायता फैला दिया। सादा वर्दी में पहुंची टीम के साथ जब हाथापाई की नौबत आई तो दारोगा उसे शांत कर सकते थे। भाजपाइयों ने एक जनप्रतिनिधि को फोन लगाया, लेकिन दारोगा ने बात भी करना मुनासिब नहीं समझा। यहीं से बात बिगड़ गई। जब टीम पूरी तरह से घेर ली गई, तब जाकर अधिकारियों को मामले की जानकारी हुई। जो भी हुआ, गलत था। न तो टीम से मारपीट होनी चाहिए थी और न ही पीडि़त के साथ अभद्रता। मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

खाकी और काला कोट आमने-सामने

पुलिस और वकील एक दूसरे के पूरक हैं। शराब प्रकरण में पुलिस और अभियोजन के सामंजस्य के चलते ही इतनी जल्दी ट्रायल प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन बीते दिनों दोनों आमने-सामने आ गए। दुष्कर्म के एक आरोपित की तलाश में पुलिस जवां में अधिवक्ता के घर दबिश देने पहुंच गई। शुरुआत में थानेदार दबिश देने की बात से इन्कार करते रहे। यहां तक कि जिस इलाके में दबिश दी गई, वहां की पुलिस भी इस कार्रवाई से अनभिज्ञ रही। इससे स्पष्ट है कि थानों में ही आपस में मेल-जोल नहीं है, लेकिन जब मामला अधिकारी के समक्ष पहुंचा तो दबिश की बात पर हामी भरी गई। बताया गया कि लोकेशन के आधार पर दबिश दी थी, लेकिन जानते नहीं थे कि वह अधिवक्ता का घर है। अगर ऐसा था तो छिपाने की क्या जरूरत थी। यहां भी सच के रास्ते पर चला जाता तो अधिवक्ताओं को हड़ताल की नौबत न आती।

Edited By: Anil Kushwaha