संतोष शर्मा, अलीगढ़ : नाट्य मंचों की जब भी चर्चा होती है, अलीगढ़ का जिक्र होता है। इसके बिना बात अधूरी जो लगती है। देशभर में धूम मचाने वाले कई कलाकार अलीगढ़ की ही तो देन हैं। मशहूर फिल्म कलाकार नसीरुद्दीन शाह, दिलीप ताहिल, एन चंद्रा, मंजर जमाल, सुरेखा सीखरी, मुजीब खान, तबस्सुम, शेख मुख्तार मुराद (रजा मुराद के पिता), बेगम पारा ये चंद वो नाम हैं, जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) ड्रामा क्लब से जुड़कर रंगमंच की दुनिया में प्रवेश किया। बालीबुड में कदम रखा तो अभिनय से धमाल मचा दिया। आधुनिक संसाधनों से लैस यह ड्रामा क्लब आज भी ऐसे नायाब हीरे तैयार कर रहा है, जो अपनी कला से यूनिवर्सिटी ही नहीं देश का नाम रोशन कर रहे हैं।

सर सैयद थे नाटक के जनक, 'लैला' बनकर आए मंच पर : एएमयू में ड्रामा क्लब की शुरुआत यूं तो 1967 से हुई, लेकिन इसकी नींव खुद यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खां ने ही रख दी थी।

1877 में फौजी छावनी की 78 एकड़ जमीन पर स्थापित मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल (एमएओ)कॉलेज के लिए सर सैयद को चंदा जुटाने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़े। इसके लिए उन्होंने छात्रों के साथ नाटक भी किए। बात 1888 के दौर की है। नुमाइश में सर सैयद ने छात्रों से चंदा जुटाने के लिए 'लैला -मजनू' नाटक का मंचन कराया। कल्चरल एजूकेशन सेंटर (सीईसी) के कोआर्डिनेटर प्रो. एफएस शीरानी बताते हैं कि पहले लड़कियों का रोल लड़के ही करते थे। 'लैला मजनू' नाटक में जिस लड़के को 'लैला' का रोल अदा करना था वह भाग गया। 'लैला' के गायब होने पर मंच पर अजीब स्थिति पैदा हो गई। तब सर सैयद ने खुद ही 'लैला' बनने का निर्णय लिया। वे घुंघरू पहन कर मंच पर आए और बोले मैं दाड़ी व उम्र नहीं छुपा सकता। आप समझ लीजिए कि मैं बूढ़ा सर सैयद नहीं नाजुक सा दिखने वाला लड़का हूं, जो 'लैला' बना खड़ा है। आप जो पैसा 'लैला' को देना चाहते थे, वह मुझे दे दीजिये। जब सर सैयद नाचने लगे तो उस समय के कलक्ट्रेट सेक्सपीयर व मौलाना शिबली ने उन्हें पकड़ लिया और नाचने से रोका। दर्शकों ने तब चंदा भी खूब दिया।

वीएम हॉल में सबसे पहले हुआ मंचन : एएमयू में सबसे पहले नाटक का मंचन वीएम हॉल के मैरिस हॉल में हुआ। यह 1940 से 1955 का दौर था। वहां यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर व छात्र नाटक का मंचन किया करते थे। प्रो. साजिदा जैदी, प्रो. जायदा जैदी, प्रो. मुनव्वर उर रहमान, हबीब तनवीर, शहादत हसन मंटो, ख्वाजा अहमद आबिदी, तलत महमूद, खुर्शीद, कादिर अल बेग वो नाम हैं, जिन्होंने मैरिस हॉल में नाटक का मंचन किया। पूर्व उप राष्ट्रपति की पत्नी सलमा अंसारी ने भी इसी हॉल में नाटक की कला सीखी थी।

कैनेडी हॉल में 1967 से हुई शुरुआत : एएमयू का ऐतिहासिक कैनेडी हॉल 1960 में बनकर दिया हुआ था। 1967 में यहां नाटकों का मंचन होना शुरू हुआ। उसी दौर में ¨हदुस्तानी ड्रामा क्लब और वेस्टर्न ड्रामा क्लब की स्थापना हुई। ¨हदुस्तानी ड्रामा क्लब के पहले सचिव नसीरुद्दीन शाह बने तो वेस्टर्न ड्रामा क्लब के सचिव प्रो. सरीफुर्रहमान। नसीरुद्दीन शाह यूनिवर्सिटी में पांच साल रहे। ड्रामा क्लब से जुड़ने के दौरान उन्होंने यहां से बीए व एमए किया। नसीरुद्दीन के अलावा इस मंच पर शहनाज हाशमी, मंजर जलाल, अफरोज ताज, मोहम्मद बादशाह, वसीम खान, अब्दुल अलीस खान, मोहम्मद शाकिर, मुजीब खान, परवेज आलम, मुजीब अख्तर, मुजीब जलाली, सुहेल नकवी, शाहिद इमाम, शाह अहमद, कामरान खुर्शीद, योगेंद्र सिंह, सुरेश यादव, जफा खान, नसीम अशरफ, सईद आलम समेत तमाम ऐसे नाम हैं, जिन्होंने कैनेडी हाल में नाटक का मंचन कर अपना नाम आगे बढ़ाया।

ऊंचाइयां छू रहा ड्रामा क्लब : एएमयू के ड्रामा क्लब ने 61 साल में बड़ी ऊंचाइयां हासिल की हैं। नाटकों को मंच प्रदान करने वाले कैनेडी हॉल का अब चेहरा मोहरा बदल गया है। री-कंस्ट्रक्शन होने के साथ पूरा हॉल वातानुकूलित हो गया है। ड्रामा क्लब की टीम आधुनिक संसाधनों से लैस हो गई है। इंतजामिया ने पहली बार प्रोग्राम डायरेक्टर की तैनाती की है। ड्रामा क्लब से बड़ी संख्या में छात्र जुड़ रहे हैं। वर्तमान में 100 से अधिक छात्र-छात्राएं क्लब से जुड़े हुए हैं। 17 साल बाद ड्रामा क्लब की टीम ने 16 से 17 फरवरी को राची विश्वविद्यालय झारखंड में हुई चैंपियनशिप को जीता। इससे पहले 2000 में नागपुर में यह खिताब जीता था।

अनार कली से लेकर ताजमहल का टेंडर तक : कैनेडी हॉल में तमाम नाटकों का मंचन हो चुका है। इनमें मुगले आजम, अनार कली, करवल कथा, ताजमहल का टेंडर, चरनदास चोर, सर सैयद, रंग नगरी, फुटपाथ, सतरंज के मोहरे, दरवाजे खोल दो, लाल किले का आखिरी मुशायरा आदि शामिल हैं।

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