अलीगढ़ (जेएनएन)। कश्मीर अगर हिंदुस्तान की जन्नत है तो वहां के छात्र-छात्राओं के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) तालीमी जन्नत। यही वजह है कि कश्मीरी अवाम के लिए सबसे ज्यादा पसंदीदी जगह पढ़ाने की कोई है तो वह है एएमयू। बीते आठ वर्षों में एएमयू में पढऩे वाले कश्मीरी विद्यार्थियों की संख्या करीब दोगुनी हो चुकी है। एएमयू में शायद ही किसी राज्य के छात्रों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ी हो। 2010-11 में यहां कुल 472 कश्मीरी स्टुडेंट पढ़ते थे। इस साल यह आंकड़ा 900 पार है। इनमें से करीब 200 छात्राएं भी हैैं।

कश्मीरी छात्रों की पहली पसंद एएमयू 

कश्मीरी लोगों की एएमयू पसंद का आलम यह है कि यहां जिनका किसी वजह से दाखिला नहीं हो पाता है, वो यहां किराए पर कमरे लेकर कोचिंग करते हैैं। ऐसे युवाओं की संख्या भी दो सौ से ज्यादा ही है, जो विभिन्न स्थानों पर कोचिंग कर रहे हैैं। एएमयू के पूर्व मीडिया सलाहकार डॉ. जसीम मोहम्मद पसंद में एएमयू को नंबर-वन रखने के पीछे तीन वजहें बताते हैैं। पहला यह कि एएमयू पूरी तरह से महफूज है और एकेडमिक माहौल बहुत अच्छा है। दूसरा यह कि एएमयू बहुत कम खर्च में एक से एक कोर्स पूरे करा देती है। तीसरा, यहां का मुस्लिम कल्चर भी उन्हें अपनेपन का अहसास देता है। कश्मीरियों को कभी 'बाहरी ' नहीं मानता। 

आखिर एएमयू कश्मीरियों का नंबर-वन क्यों

  • एएमयू पूरी तरह से महफूज
  • एकेडमिक माहौल बहुत अच्छा
  • कल्चर में अपनेपन का अहसास 
  • छात्रों के प्रति बाहरी का भाव नहीं 

मनवाते काबिलियत का लोहा 

कश्मीर के तमाम छात्र ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने काबिलियत का लोहा मनवाया है। आतंक की राह चुनने वाले मन्नान वानी का रूम मेट मुजम्मिल हुसैन जिऑलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में क्लॉस वन ऑफिसर है। एएमयू में देश-विदेश के 29 हजार से अधिक छात्र पढ़ते हैं। इनमें विदेशियों की संख्या भी चार सौ से अधिक है। कैंपस में हर राच्य के छात्रों का अपना एक नेटवर्क भी रहता है। ऐसा छात्र संघ चुनाव में अधिक देखने को मिलता है। चुनाव में कश्मीरी छात्र भी संख्या बल के आधार पर पांसा बदलने का काम करते हैं। पिछले चुनाव में उपाध्यक्ष का चुनाव लड़े सज्जाद सुभार रॉथर की जीत का कारण भी यही रहा। यह पहला मौका था जब कोई कश्मीरी में चेयर के लिए चुना गया हो। इससे पहले के चुनाव में भी कश्मीरी छात्रों की निर्णायक भूमिका रही है।

 

कश्मीरी छात्रों का विवादों से लंबा नाता

एएमयू में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों का विवादों से लंबा नाता रहा है। फरवरी 2013 में संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद में एएमयू में कश्मीरी छात्रों ने शहीद का दर्जा दिया है। अफजल की फांसी के बाद छात्रों ने मौलाना आजाद लाइब्रेरी के पास नमाज-ए-जनाजा (गायबाना) पढ़ी और अफजल को शहीद का दर्जा दिया। फांसी दिए जाने के विरोध में एएमयू में छात्रों ने प्रोटेस्ट मार्च भी निकाला था। छात्रों की के इस कृत्य की आलोचना हुई लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। मन्नान की एएमयू को दी टीस की भरपाई में बड़ा वक्त लगेगा। 17 अक्टूबर को सर सैयद डे से पहले गुरुवार को मन्नान के समर्थन देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों ने यूनिवर्सिटी के दामन दाग लगाने का काम किया है। एएमयू को नंबर-1 बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे कुलपति की टीम के लिए यह बड़ा झटका भी है।

राह भटकी मन्नान की कलम 

एएमयू के भूू-गर्भ विज्ञान विभाग का शोध छात्र रहा मन्नान वानी जनवरी में अचानक आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़कर भाग गया था। पता तब लगा, जब रायफल लिए तस्वीर वायरल हुई। फिर, एएमयू ने उसे निष्कासित कर दिया। इसके बाद उसका एक वीडियो वायरल हुआ। जिसमें हव जेहाद की बातें करते हुए सुना गया। एक तस्वीर और सामने आई। जिसमें वह दो आतंक वादियों के साथ एके-47 लिए नजर आया। इसके बाद से ही वह सेना के निशाने पर था। 11 अक्टूबर को देश के बहादुर सैनिकों ने उसे उसके एक अन्य साथी के साथ ढेर कर दिया।

पुलिस को आरोपी छात्रों की तलाश

मन्नान के मारे जाने की सूचना के बाद ही एएमयू कैंपस में कश्मीरी छात्र एक जुट हुए और जनाजे की नमाज पढऩा चाहते थे। प्रॉक्टोरियल टीम ने रोका तो मारपीट पर उतारू हो गए। इसी बीच कुछ कुश्मीरियों ने देश विरोधी नारों के साथ आजादी चाहिए के नारे लगाए। इंतजामिया ने आरोप में बायोकेमिस्ट्री डिपार्टमेंट से पीएचडी कर रहे वसीम अय्यूब मलिक पुत्र मुहम्मद अय्युब मलिक निवासी जिला शोपियां (जम्मू कश्मीर) व इतिहास विभाग में पीएचडी कर रहे अब्दुल हसीद मीर पुत्र मुहम्मद रजब मीर निवासी जिला कुलगाम (जम्मू कश्मीर) को निलंबित कर दिया। सात छात्रों को नोटिस दिया गया है। सिविल लाइंस थाने में वसीम अय्यूब मलिक व अब्दुल हसीद मीर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है। पुलिस दोनों की तलाश में जुटी हुई है। 

आतंकी की तस्वीरें बांटकर चर्चा में था मन्नान 

एएमयू के हबीब हॉल में रहने वाला बुरहान वानी उस वक्त सुर्खियों में आया था, जब उसने कश्मीर में मारे गए आतंकी बुरहान वानी के समर्थन में कैंपस में पोस्टर बांटे थे। तब, पुलिस व इंतजामिया ने सामान्य बात मानकर नजरअंदाज कर लिया था। वजह शायद यह भी रही कि मन्नान एक मेधावी छात्र था। उसे पिछले साल भोपाल में हुई एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में शोधपत्र के लिए सम्मानित भी किया गया था। हबीब हॉल के कमरा नंबर 237 में रहने वाला मन्नान दो जनवरी को लापता होने के बाद सात जनवरी को सोशल मीडिया पर एके-47 के साथ प्रकट हुआ तो आठ जनवरी को तत्कालीन एसएसपी राजेश कुमार पांडेय की अगुवाई में उसके कमरे का ताला तोड़कर तलाशी ली गई। इसमें भड़काऊ साहित्य, कुछ किताब, डायरी व इलेक्ट्रॉनिक सामान के सिवाय कुछ न मिला। कुपवाड़ा जिले के गांव टकीपोरा लोलब का मन्नान भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रो. अली अहमद के निर्देशन में पीएचडी कर रहा था। यहीं एमएससी की। आतंकी बनने की खबर से कैंपस में भूचाल आ गया था। 

अपने गांव के स्ट्रक्चर पर मन्नान का शोध

मन्नान ने संरचनात्मकता विषय पर अपने गांव टकीपोरा पर शोध शुरू किया था। पृथ्वी की विकृति को समझने के साथ उसे भू-गार्मिक तरीके से वैश्विक विश्लेषण भी करना था। 22 जनवरी-18 को उसका पेपर था, लेकिन वह पहले ही लापता हो गया। मन्नान पढऩे में भी तेज था। 

इंटरनेट कॉलिंग के चलते पकड़ में नहीं आया 

मन्नान वानी ने आतंकी संगठनों के संपर्क में आने के बाद इंटरनेट कॉल का ही सहारा लिया। इससे सुरक्षा एजेंसियां उस तक नहीं पहुंच सकीं। उस समय अलीगढ़ में एसएसपी रहै राजेश कुमार पांडेय ने जागरण को बताया कि मन्नान को लेकर लोकल मॉड्यूल नहीं मिला। न ही उसके किसी जूनियर या सीनियर की जांच हुई। ऐसा लगता है कि आतंकी संगठन से जुडऩे की बात सार्वजनिक होने के काफी पहले वह आतंकी बन चुका था। हमने उसके मोबाइल नंबर की कॉल डिटेल पर बहुत काम किया था।

छात्रों की जांच में कुछ हाथ नहीं लगा

एएमयू में पढऩे वाले अधिकांश छात्रों से उसके संपर्क को जांचा गया, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा। एएमयू में वह छात्रों के अधिक संपर्क में नहीं रहा था। इससे यह स्पष्ट हो गया कि उसने इंटरनेट कॉलिंग की मदद ली थी। वाट्सएप कॉल को रिकार्ड नहीं किया जा सकता। मन्नान का कश्मीर में ही लोकल नेटवर्क था। उसके परिजनों ने भी यही बताया था कि वह जब भी घर जाता था, काफी समय बाहर ही बिताता था। पांडेय यह भी बताते हैं कि एएमयू कैंपस में उसने आतंकियों का कैलेंडर भी बांटा था। इसकी बाद में पुष्टि भी हो गई थी। उसका रूम पार्टनर भी उस समय गायब था। इससे शक और गहराया था। मगर, बाद में उसे बुलाकर बात की तो पता चला कि वह तो नौकरी कर रहा है। 

मन्नान ने ताजा की थी सिमी की यादें 

आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़कर एएमयू से मन्नान वानी ने स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) की याद ताजा की थीं। 39 साल पहले एएमयू के ही कुछ छात्रों ने इस संगठन की नींव रखी थी। इस संगठन के गठन के बाद पहली बार एएमयू का नाम आतंकी संगठनों से जुड़ा था। यह संगठन एक दशक बाद ही रास्ता भटक गया। 80 के दशक में ही तमाम कार्यकर्ता उग्रवाद की ओर बढ़ चुके थे। इनकी राष्ट्रविरोधी हरकतें तब सामने आईं, जब अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस हुआ। तब सिमी नेताओं ने तिरंगे तक को सलाम करने से इन्कार कर दिया था। कई राज्यों में बम धमाकों में संलिप्तता की पुष्टि के बाद प्रतिबंध लगा दिया गया। तभी से अलीगढ़ के शमशाद मार्केट में खुला संगठन का दफ्तर सील है। 

आपातकाल की भी यादें

1975 में आपातकाल के दौरान तमाम छात्र संगठनों पर भी पाबंदी लगी थी। आपातकाल हटा तो छात्रों को लामबंद करने के इरादे से 25 अप्रैल 1977 को मुहम्मद अहमदउल्ला सिद्दीकी ने अलीगढ़ में सिमी की स्थापना की। शुरुआती सदस्यों में कुछ एएमयू छात्र थे, कुछ पूर्व छात्र। गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) के रहने वाले सिद्दीकी तब एएमयू से एमएससी (फिजिक्स) कर रहे थे। वे ही संस्थापक अध्यक्ष बने। दफ्तर खुला एएमयू से सटे शमशाद मार्केट के एक कमरे में। सिमी सदस्य जमात-ए-इस्लामी से प्रभावित थे। खुफिया इकाइयों से जुड़े सूत्र बताते हैं कि 80 के दशक में ही महाराष्ट्र, गुजरात व मध्यप्रदेश के कई सदस्य कश्मीरी उग्रवादियों के संपर्क में आ गए। ये बातें उजागर होनी शुरू हुईं 1992 में बाबरी ढांचा विध्वंस होने के बाद। इसके बाद कट्टरवाद और बढ़ा। सिमी की उर्दू व अंग्रेजी भाषा में निकलने वाली पत्रिका में भी च्वन-बुक, वन-प्रे (सिर्फ कुरान व अल्लाह को मानने) की बातें मुखर होकर कही जाने लगीं। 

2002 में लगा प्रतिबंध

मात-ए-इस्लामी को इसका आभास हुआ तो उसके सदस्य किनारा कर गए। नेक इरादे से जुड़े तमाम दूसरे लोग भी सिमी से अलग हो गए। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश समेत कई राच्यों में बम धमाके हुए। आगरा में सिनेमाघर और बस में हुए बम धमाकों में भी सिमी के हाथ की पुष्टि हुई। केंद्र सरकार ने 2002 में आतंकी संगठन घोषित करते हुए सिमी की गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी। कार्यालय भी सील कर दिया। एक दिन के लिए राहत भी मिली, लेकिन अगस्त 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर प्रतिबंध लगा दिया। यह अभी तक बरकरार है। इंडियन मुजाहिदीन को अब सिमी का ही नया रूप माना जाता है। 

चुनाव भी लड़ा

सिमी ने एएमयू में घुसपैठ की भरपूर कोशिश की थी पर कामयाब न हो सका था। सिमी से जुड़े कुछ छात्रों को एएमयू स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में भी उतारा गया था, पर वे जीत नहीं सके। सिमी ने 1999 में एएमयू के गुलिस्तान-ए-सैयद पार्क में राष्ट्रीय स्तर की सेमिनार की थी। कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी भी आए थे। 

एएमयू पर पहले भी लगे दाग 

  • 16 साल पहले 2001-2002 में इसी हबीब हॉल में मुबीन नाम के छात्र को आतंकवादी संगठन से जुड़े होने के शक के आधार पर उठाया था। इसे लेकर काफी विरोध हुआ। छात्रों ने कई दिनों तक आंदोलन भी किया। बाद में सुबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया गया। 
  • सितंबर 2016 में जम्मू कश्मीर के उड़ी में सेना की छावनी पर आतंकवादी हमले में शहीद हुए जवानों पर एएमयू छात्र मुदासिर यूसुफ लोन ने अभद्र टिप्पणी की थी। जिससे इंतजामिया ने निष्कासित कर दिया। 
  • फरवरी 2013 में संसद पर हमले के मास्टर माइंइ अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद में एएमयू छात्रों ने शहीद का दर्जा दिया है। अफजल की फांसी के बाद छात्रों ने मौलाना आजाद लाइब्रेरी के पास नमाज-ए-जनाजा (गायबाना) पढ़ी और अफजल को शहीद का दर्जा दिया। फांसी दिए जाने के विरोध में एएमयू में छात्रों ने प्रोटेस्ट मार्च भी निकाला था।

 

Posted By: Nawal Mishra