अलीगढ़: 1953 में बदला AMU छात्र संघ का संविधान, बड़ा रोचक है इतिहास; डॉ. जाकिर हुसैन को श्रेय
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ के नेतृत्व की व्यवस्था समय के साथ बदली, जिसमें 1953 में संविधान संशोधन के बाद ...और पढ़ें

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का प्रवेश द्वार।
HighLights
छात्रों को अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव चुनने का अधिकार मिला।
डॉ. जाकिर हुसैन ने बदलाव में निभाई अहम भूमिका।
जागरण संवाददाता, अलीगढ़। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में छात्रसंघ के नेतृत्व की व्यवस्था समय के साथ बदली। शुरुआत में कालेज के प्रिंसिपल और बाद में कुलपति यूनियन के अध्यक्ष होते थे। वर्ष 1953 में संविधान संशोधन के बाद छात्रसंघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव चुनने का अधिकार विद्यार्थियों को मिला।
विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले 1920 तक मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल (एमएओ) कालेज के प्रिंसिपल ही छात्रसंघ के अध्यक्ष होते थे। कालेज के पहले प्रिंसिपल एचजीआई सिडंस यूनियन के पहले अध्यक्ष बने थे, जबकि उपाध्यक्ष और सचिव का चुनाव विद्यार्थी करते थे। सिडंस क्लब में वाद-विवाद प्रतियोगिताएं आयोजित होती थीं, जिनके जरिए छात्रों को अपनी बात रखने और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का अवसर मिलता था।
पूर्व राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन भी छात्र जीवन में इस परंपरा से जुड़े रहे। वर्ष 1918 में वह उपाध्यक्ष चुने गए थे। 1920 में विश्वविद्यालय बनने के बाद वर्ष 1950 तक कुलपति यूनियन के अध्यक्ष होते थे। डा. जाकिर हुसैन 1948 में एएमयू के कुलपति बने। उनके कार्यकाल में वर्ष 1953 में विश्वविद्यालय के संविधान में संशोधन हुआ। इसके बाद छात्रसंघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव का चुनाव विद्यार्थियों के माध्यम से होने लगा।
प्रिंसिपल से कुलपति तक रहे अध्यक्ष, 1953 से छात्रों के हाथ आई कमान
एएमयू छात्रसंघ का इतिहास समय के साथ बदलती लोकतांत्रिक परंपराओं का भी गवाह है। विश्वविद्यालय बनने से पहले मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल (एमएओ) कालेज में प्रिंसिपल ही छात्रसंघ के अध्यक्ष होते थे, जबकि उपाध्यक्ष और सचिव का चुनाव छात्र करते थे। एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डा. राहत अबरार के अनुसार, कालेज के पहले प्रिंसिपल एचजीआइ सिडंस यूनियन के पहले अध्यक्ष बने थे।
उस दौर में सिडंस क्लब में वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती थीं, जिनके जरिए विद्यार्थियों में तर्क-वितर्क और नेतृत्व क्षमता विकसित की जाती थी। वर्ष 1918 में छात्र जीवन के दौरान डा. जाकिर हुसैन उपाध्यक्ष चुने गए थे। वर्ष 1920 में विश्वविद्यालय बनने के बाद भी व्यवस्था में बदलाव नहीं हुआ। वर्ष 1950 तक कुलपति यूनियन के अध्यक्ष होते थे।
डा. जाकिर हुसैन 1948 में कुलपति बने और 1953 में विश्वविद्यालय के संविधान में संशोधन किया। इसके बाद छात्रसंघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव के चुनाव की जिम्मेदारी विद्यार्थियों को मिली। इस बदलाव ने छात्रसंघ को निर्वाचित प्रतिनिधियों के नेतृत्व वाली संस्था का स्वरूप दिया।
