अलीगढ़[जेएनएन]: स्क्रैप कारोबारी के इलाज में लापरवाही के आरोप की जांच कर रहे सीडीओ ने रिपोर्ट डीएम को सौंप दी है। उन्होंने दस लोगों के बयान लिए हैैं। इनमें सीएमओ, संक्रमित कारोबारी के स्वजन व स्वास्थ्य विभाग के अन्य अफसर शामिल हैं। रविवार को रिपोर्ट सार्वजनिक हो सकती। डीएम ने बताया कि जांच रिपोर्ट का परीक्षण कर रहे हैैं। जल्द ही इस पर फैसला होगा। समय में इलाज न मिलने से कारोबारी की मौत हो गई थी। बाद में रिपोर्ट कोरोना संक्रमित आई थी।

लॉकडाउन 4 न्यूज स्याही के सुर : कुछ दवा कीजिए तब मौत का यह दर्द कम हो पाएगा

अवधेश माहेश्वरी अलीगढ़ : स्क्रैप कारोबारी तड़प रहे हैं। वह कभी दाईं करवट होते हैैं तो कभी बाईं। वह कराहते हैैं, तो दूसरे मरीज भी उनके दर्द  की पीड़ा महसूस करने लगते हैैं। कारोबारी बमुश्किल हिम्मत कर जेब से फोन निकालते हैैं। बेटे को नंबर डायल कर कहते हैैं कि मैैं यहां भूखा हूं, कुछ खाने को मिल जाए। सांस लेने में दिक्कत हो रही है। ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की दवा देने वाला कोई नहीं है। मैैं यहां तो मर जाऊंगा, मुझे ले जाओ। एक बीमारी के चलते 'लक्ष्मण रेखाÓ में बंधा बेटा जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी के हाथ जोड़ रहा है कि मेरे पिता को बचा लो। उनको दवा और खाने को दिला दो। इसके बाद भी न दवा मिलती है और नाश्ता, हां आश्वासन की गंध जरूर उठती है। स्क्रैप कारोबारी आखिर दम तोड़ देते हैैं। अब इसे क्या कहें? क्या यहां कोरोना काल बन गया या उनकी लापरवाही, जिन पर एक मरीज की जिंदगी बचाने का भार था।

कोरोना से मौत की दर 10 फीसद

अलीगढ़ में कोरोना से मौत की दर 10 फीसद के आसपास है। यह प्रदेश और राष्ट्रीय के औसत से ज्यादा है। स्क्रैप कारोबारी की मौत कहीं ना कहीं इसकी कहानी कह रही है। कोरोना थोड़ी सी लापरवाही से घातक हो जाता है। ऐसे में जिला प्रशासन और चिकित्सा विभाग के कंधे पर अहम जिम्मेदारी थी। क्वारंटाइन सेंटर इसीलिए स्थापित किए गए थे कि वहां जिंदगी के लिए जूझ रहे मरीजों को सहायता मिले लेकिन वहां कारोबारी को मिली मौत ने व्यवस्था की असफलता के सवाल उठा दिए हैैं। फोन पर बेटे और क्वारंटाइन सेंटर पर भर्ती पिता के बीच हुआ संवाद साफ-साफ सब बयां कर रहा है।

टीम के सदस्यों ने दवा ले जाने से क्यों रोका?

 चिकित्सा विभाग के अहम अधिकारी कह रहे हैैं कि बीपी और शुगर की दवा मरीज को साथ ले जानी चाहिए थी, तो आखिर कारोबारी को लेने पहुंची टीम के सदस्य ने उनको क्यों रोक दिया? एक संक्रामक बीमारी में जमीन पर गद्दा क्यों डाला गया? क्या वहां पर्याप्त पलंग नहीं थे। क्या मेडिकल प्रशासन यह नहीं जानता था कि एक गंभीर मरीज के लिए इस तरह की व्यवस्था उसे जिंदगी नहीं मौत दे देगा। बीपी और डायबिटीज के मरीज को समय से दवा और नाश्ता देने की जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाई जा सकी? उस पिता की पीड़ा का अनुमान ही लगा सकते हैैं, जब वह बेटे से यह कहता है कि मैैं तो उठ भी न सका, कपड़ों में ही टॉयलेट निकल गया। क्या क्वारंटाइन सेंटर की व्यवस्था इतनी चौपट हैैं? ऐसे में तो यह और मरीजों की जिंदगी के लिए भी खतरा हो गई हैैं। डीएम कह रहे हैैं कि वह मामले की जांच करा रहे हैैं, निश्चित रूप से जांच हो परंतु उससे पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि वहां मरीजों को जाने में घबराहट न हो।

इन हालात में तो जांच से बचेंगे मरी

आज कोरोना से जितनी घबराहट नहीं, उससे ज्यादा क्वारंटाइन सेंटर्स के हालात की खबरों से तबियत बिगड़ रही है। निश्चित रूप से कोरोना जैसी बीमारी से लडऩे में यह अविश्वास घातक है। यह शहर में संक्रामक बीमारी के प्रकोप को तेज कर सकता है, क्योंकि ऐसी हालत में गंभीर बीमार भी जांच से बचेंगे। वह घर में ही इलाज की कोशिश करेंगे।

आगे जिंदगियां ऐसी लापरवाही से हवन न हो जाएं

साथ ही उस बेटे को सिर्फ अब सांत्वना के दो शब्द ही कहे जा सकते हैैं, जो अपने पिता को बचाने के लिए खुद भी दर्द में डूब गया। जिम्मेदारों के हाथ जोड़ता रहा। उसका दर्द कम हो सकता है, यदि व्यवस्था सही हो जाएं। आगे जिंदगियां ऐसी लापरवाही से हवन न हो जाएं।

Posted By: Sandeep Saxena

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