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    Bluethroat Bird: 10 ग्राम का नीलकंठी पक्षी, 10 हजार KM की हवाई उड़ान भरकर आगरा पहुंचा

    Updated: Sat, 29 Nov 2025 09:54 AM (IST)

    नीलकंठी पक्षी, एक छोटा प्रवासी पक्षी है जो हर साल 10 हजार किमी की यात्रा करके सर्दियों में आगरा आता है। यह फ्लाईकैचर परिवार का सदस्य है और इसे नीलकंठी के नाम से जाना जाता है। यह सितंबर से अप्रैल तक भारत में रहता है और वेटलैंड और नदी के किनारों पर देखा जा सकता है। नर नीलकंठी को उसके गले पर नीली पट्टी से पहचाना जाता है।

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    नीलकंठी (ब्लूथ्रोट) पक्षी।

    जागरण संवाददाता, आगरा। नीलकंठी (ब्लूथ्रोट) पक्षी, प्रकृति की अनोखी संरचना और जीवन की अदम्य जिजीविषा का उत्कृष्ट उदाहरण है। वजन मात्र 10 ग्राम और आकार सिर्फ 12 से 14 सेमी, लेकिन नन्हें आकार वाला यह प्रवासी पक्षी प्रतिवर्ष 10 हजार किमी लंबी हवाई यात्रा कर सर्दियों में आगरा पहुंचता है। अपनी सूक्ष्म काया के बावजूद इतनी लंबी उड़ान भरना इसे प्रकृति का अद्वितीय चमत्कार बनाता है।

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    सितंबर से आगरा में डेरा डाले है ब्लूथ्रोट, फ्लाईकैचर परिवार का छोटा पक्षी


    आगरा कॉलेज की जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. अमिता सरकार ने बताया कि ब्लूथ्रोट पक्षी की विश्वभर में 10 उप-प्रजातियां पाइ जाती हैं। यह पुरानी दुनिया के फ्लाईकैचर परिवार का गौरैया जैसा छोटा पक्षी है। हिंदी में इसे नीलकंठी कहा जाता है। वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार यह पक्षी पैसरिफोर्मेस गण और मस्किकैपिडे परिवार के अंतर्गत आता है।

    यह एक कीटभक्षी पैसराइन पक्षी


    विश्वविद्यालय के जंतुविज्ञान विभाग के प्रो. विश्वकांत गुप्ता के अनुसार यह एक कीटभक्षी पैसराइन पक्षी है। भारत में इसका आगमन सितंबर से अप्रैल तक रहता है। प्रवास के दौरान यह वेटलैंड, नहरों के किनारे, धान के खेतों, नदी तटों और दलदली नम क्षेत्रों में आसानी से देखा जा सकता है।

    नदी और दलदली नम क्षेत्रों में बनाता है ठिकाना


    बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के पक्षी विशेषज्ञ डा. केपी. सिंह बताते हैं कि भारत के उत्तर और उत्तर-पूर्व हिस्से में पाई जाने वाली इस प्रजाति का वैज्ञानिक नाम लुसिनिया स्वेसिका है। नर ब्लूथ्रोट की पहचान उसके गले पर मौजूद गहरी नीली पट्टी और लाल-मेहरून रंग के धब्बे से होती है, जबकि मादा के गले पर यह पैटर्न हल्का होता है। यह पक्षी पश्चिमी अलास्का, रूस के साइबेरिया और उत्तरी चीन के जैव-भौगोलिक क्षेत्रों में प्रजनन करता है। वहां से यह सेंट्रल एशियन फ्लायवे के रास्ते उड़ान भरते हुए भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करता है और आगरा सहित उत्तर भारत के शहरों को अपना सर्दियों का ठिकाना बनाता है।