आगरा, अंबुज उपाध्‍याय। नागपुर वाले परिवार के साथ कमल दल की गुफ्तगू होटलों वाली सड़क पर हुई तो पड़ोस का पूरा क्षेत्र जुटा डाला। चौथाई दर्जन वजीर तो इतने ही दिल्ली वाले प्रवासी और इतने ही लखनऊ वाले थे। मीलों तय कर पहुंचने वालों के साथ हमराह आए, सारथी और अंगरक्षकों की भी कमी नहीं थी। सत्कार संस्कृति के लिए प्रसिद्धी पाने वाले भगवा खेमे ने जिम्मेदारों को तो होटल में प्रवेश कराया लेकिन हमराहों को बाहर ही रोक दिया। मैराथन चिंतन चला तो सुबह से दोपहर हो गई। अब तो चूहों ने भी अपने स्थान पर दौड़ शुरू कर दी। कुछ देर बाद हमराहों ने देखा कि नेता जी तो पेट पर हाथ फेरते आ रहे, लेकिन उनका इंतजाम नहीं। चहेतों ने पूछा भी, लेकिन एक का मुंह खुल ही गया-भैया सत्ता संस्कार बदल रही।

‘भगीरथ’ कौन

कालिंदी की कल कल घटी तो शहर की प्यास बढ़ती चली गई। जनता ने त्रहिमाम किया तो गंगा अवतरण के लिए भगीरथ प्रयास शुरू हुए। दक्षिण का विधान संभालने वाले नेताजी ने प्रयासों का जिम्मा उठाते हुए ताज से लेकर कान्हा नगरी तक बाधाएं हटवाईं। भोले बाबा ने स्वर्ग से गंगावतरण कराया था तो दक्षिण वाले नेता जी बुलंदशहर से गंगा लाने के लिए वहां तक हो आए। तप-साधना में लीन होकर लखनऊ में वजीर-मुखिया को प्रसन्न किया। भागीरथ प्रयास देख दूसरे नेताओं में भी हलचल हुई।

यह बताने के लिए कि असली भगीरथ कौन है, शहर के प्रथम पूज्य व छावनी वाले नेताजी को साथ लेकर दौड़-भाग शुरू की। दक्षिण वाले भगीरथ भी कहां रुकने वाले थे। उन्होंने भी तिकड़ी बना ली। प्रथम गंगावतरण पर पीएम से पीठ ठुकवाने में चूक गए थे। इस बार नहीं चूकना चाहते। मकर संक्रांति से पहले पुराने शहर में भी गंगावतरण होगा। दोनों चाहते हैं कि उस दिन उनके नाम पर ही हर हर गंगे हो।

जब से जिले में कमल खिला और हाथी की चिंघाड़ मद्धिम पड़ी, हालात बदले हैं। नए समीकरण और रणनीति बन रही है। कुछ ने दिल्ली दरबार सजने से पहले ही किनारा कर लिया तो कुछ को बाद में दरवाजा दिखा दिया गया। ताज से लेकर तालानगरी तक राज करने वालों के पैर जबसे उखड़े हैं, तबसे कई दूसरे मैदान में आ जमे। मायावी दरबार में भविष्य सुरक्षित रखने के लिए ‘जमीन’ तैयार कर रहे हैं। दरबार के नियम-कायदों के मुताबिक चढ़ावा चढ़ाने की परंपरा है। दरबारियों को इसके लिए यजमान तलाशने होते हैं। यहीं असली प्रतिस्पर्धा मची है। एक लाल इसमें बाजी मार ले गया। यजमानों को समझाया कि लोकतंत्र के अर्धकुंभ में अखाड़ा सजाकर शाही स्नान करना है तो दरबार में एडवांस हाजिरी लगाओ, लेकिन खाली हाथ मत जाओ। नुस्खा हिट रहा। अब यजमान उनके दरबार में चढ़ावे के साथ हाजिरी लगा रहे।

नए सूरमा के बड़े दावे

नए सूरमा उत्साह में हैं। हाल ही में नागपुर वालों ने शहर के बीचो बीच संभ्रांतों की ‘शाखा’ लगाई तो इससे पहले तैयारियों का जायजा भी लिया। पत्थर वाले शहर के आंगन में परिवार के सभी लोगों को बुलाया गया। पूछा गया कि शहर के बीचो बीच हजारी इमारत में कौन कितना कुनबा जुटाएगा और बड़े मैदान में कितना? हजारी भवन में कितने कमल खिलेंगे? इस पर सूरमा मैदान में आ गए। भवन की क्षमता से 20 गुना का दावा कर दिया। एकबारगी तो सबके चेहरे पर मुस्कान तैर गई। परिवार के मुखिया ने सुधार का अवसर देते हुए घुमा फिरा पूछा, लेकिन सूरमा टस से मस न हुए। अब आम तौर पर भौंहें चढ़ा लेने वाले मुखिया भी चुप हो गए। फिर चुटकी ली-‘दावे का ढाई फीसद ले आना।’ आखिर सूरमा हैं तो उन्हीं के अखाड़े से!

 

Posted By: Tanu Gupta

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