आगरा, अजय शुक्‍ला। अकबर के नौ रत्नों में संगीत सम्राट तानसेन का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उनके बारे में कई किंवदंतियां प्रचलित हैं, तो कुछ तथ्य भी हैं जिन्हें उस दौर के दरबारी इतिहासकारों ने दर्ज किया है। कहते हैं, तानसेन राग दीपक गाकर तेल में डूबे दीपकों को अपनी संगीत प्रतिभा से प्रज्ज्वलित कर दिया करते थे। जहां वह संगीत साधना किया करते थे, फतेहपुरी सीकरी के किले में वह स्थान 'तानसेन का चबूतरा' नाम से आज भी प्रसिद्ध और मौजूद है।

यह स्थान इसलिए भी प्रसिद्ध है, क्योंकि यही वह जगह है जहां चंदेरी के पंडित बैजनाथ मिश्र से उनका इतिहास प्रसिद्ध संगीत मुकाबला हुआ था। पंडित बैजनाथ मिश्र की आम जनमानस में बैजू बावरा के नाम से ख्याति है। 1952 में बनी फिल्म बैजू बावरा ने उन्हें और प्रसिद्ध कर दिया।

सीकरी के किले में पंचमहल के सामने तानसेन का चबूतरा मानव निर्मित अनूप तालाब के बीचोबीच बना है। इस गहरे तालाब में हर वक्त पानी रहता है। चबूतरे तक पहुंचने के लिए चार ओर से दीवारनुमा गैलरी बनी है। यहां तानसेन नियमित रियाज किया करते थे और संगीत सभाओं का आयोजन होता था। इस स्थान को देखकर कल्पना की जा सकती है, मुगलकालीन वैभव के दौर में यहां कैसी संगीत सभाएं होती रही होंगी।

तानसेन वृंदावन के हरिदास के शिष्य थे। जन्म से ब्राह्मण तानसेन पहले राजपूत राजाओं के दरबारी गायक थे। उनकी संगीत प्रतिभा की ख्याति अकबर तक पहुंची तो उन्होंने तानसेन को अपना दरबारी गायक बना लिया। बाद में उन्हें 'मियां' और 'संगीत सम्राट' की उपाधियां दीं। तानसेन ने सूफी संत गौस मोहम्मद से प्रभावित होकर इस्लाम अपना लिया था और ग्वालियर में उनका मकबरा आज भी मौजूद है, जहां हर साल तानसेन संगीत समारोह का आयोजन किया जाता है।

एक किंवदंती प्रचलित है कि अकबर ने शर्त रखी कि जो संगीत में तानसेन को हराएगा उसे वह दरबारी गायक नियुक्त करेंगे, लेकिन हारने वाले को मृत्युदंड दिया जाएगा। यह चुनौती पंडित बैजनाथ मिश्र ने स्वीकारी। मुकाबला हुआ तो तानसेन जीते लेकिन हारने वाले पंडित बैजनाथ मिश्र को मृत्युदंड से अकबर ने मुक्त कर दिया। यद्यपि, इस किंवदंती पर कम ही लोग भरोसा करते हैं। खुद कई इतिहासकारों ने लिखा है कि तानसेन की हार हुई और उन्हें मृत्युदंड व स्वयं को दरबारी गायक के पुरस्कार से मुक्त कर बैजनाथ मिश्र ग्वालियर चले गए और वहां राजा मानसिंह के दरबार नियुक्त हो गए।

तानसेन की तरह ही बैजनाथ मिश्र भी हरिदास के शिष्य थे। माना जाता है कि ध्रुपद गायन शैली का आविष्कार हरिदास ने ही किया था और तानसेन व बैजनाथ मिश्र ने उसे संवद्र्धित कर आगे बढ़ाया। ढाई दशक से सीकरी किले के गाइड मोहम्मद चांद उर्फ भारत सरकार पंडित बैजनाथ मिश्र के बारे में दिलचस्प जानकारियां रखते हैं। वह खुद भी वृंदावन के रहने वाले हैं। बताते हैं कि बैजनाथ मिश्र को प्यार से लोग 'बैजूÓ बुलाते थे। कलावती नाम की उनकी प्रेयसी थी, जिसके प्रेम वह इस कदर डूबे कि लोग उन्हें बैजू बावरा कहने लगे। यही कलावती उनकी प्रेरणास्रोत थी जिसके कारण वह संगीत साधना के चरम पर पहुंचे। बैजू के ताऊ बाबा को तानसेन ने एक बार संगीत प्रतियोगिता में हराया था। इसके बाद बैजू ने तानसेन के गुरु हरिदास से संगीत शिक्षा ली। जब अकबर ने तानसेन से मुकाबले की कठिन शर्त रखी तो बैजू ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।

स्वभाव से जिज्ञासु और शोध में गहरी रुचि रखने वाले गाइड मोहम्मद चांद एक और नई जानकारी देते हैं। बताते हैं, तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक नहीं तीन मुकाबले हुए थे। पहला मुकाबला, आगरा फोर्ट में हुआ। बैजू बावरा ने गाना शुरू किया तो पत्थर पिघलने लगे। लावे सरीखे पिघलते पत्थरों में उन्होंने तलवार गड़ा दी और तानसेन को चुनौती दी कि अब वह अपने गायन से पुन: पत्थर पिघलाकर तलवार निकालें। तानसेन ने बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। दूसरा मुकाबला सिकंदरा में हुआ। यह स्थान सिकंदर लोदी का था, जिसे बाद में मुगलों ने अपने अधिकार में ले लिया। यह सुरम्य स्थान आज अकबर के मकबरे के कारण प्रसिद्ध है। उस समय वनाच्छादित इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में हिरण विचरण करते थे। आगरा-दिल्ली हाईवे से सटे इस स्थान पर आज पर्यटकों के बीच बड़ी संख्या में हिरण स्वच्छंद विचरण करते हैं। बैजू बावरा ने गाना शुरू किया तो उनके संगीत से मोहित बड़ी संख्या में हिरण खिंचे चले आये। बैजू ने उन्हें पुष्पहार पहनाकर वापस कर दिया। चुनौती रखी कि अब तानसेन हिरणों को वापस बुलायें। तानसेन यह चुनौती भी पूरी न कर पाये।

तीसरा और अंतिम मुकाबला तानसेन के चबूतरे पर हुआ। इस मुकाबले के बाद विजेता घोषित किया जाना था। अकबर समेत सभी दरबारी व दूर-दूर से आये संगीतज्ञ मौजूद थे। इस बार तानसेन ने अपना प्रसिद्ध राग दीपक गाना शुरू किया। कुछ ही देर बाद संगीत के सामथ्र्य से दीपक स्वत: जलने लगे। लेकिन, तानसेन के संगीत के कारण तापमान इतना बढ़ गया कि अतिथियों के वस्त्र आदि जलने लग गए। भीषण अग्निकांड की स्थिति उत्पन्न हो गई। उसी समय बैजू बावरा ने मेघ मल्हार गाना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में बादलों की घनी-काली घटाएं घिर आईं और बारिश से अग्नि शांत हुई। इस तरह अंतिम मुकाबला बराबरी पर छूटा। कालांतर में बैजू बावरा श्रीनगर नरेश के दरबार में चले गए और वहां काफी समय तक रहे। तानसेन यहीं अकबर के दरबार में बने रहे। 

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Posted By: Prateek Gupta

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