आगरा, जागरण संवाददाता। दुनिया में आगरा को अगर सात अजूबों में शुमार ताजमहल के लिए जाना जाता है तो यहां के जूतों का भी विश्व दीवाना है। भारतीय क्रिकेट टीम के 1983 का विश्व कप जीतने पर बनी फिल्म 83 में भी आगरा के जूतों का जलवा दिखेगा। फिल्म में क्रिकेटर बने कलाकार आगरा के शू डिजाइनर देवकीनंदन सोन द्वारा डिजाइन किए गए जूते पहने हुए नजर आएंगे।

शिल्पग्राम के नजदीक स्थित होटल ताज प्लाजा में बुधवार को हुई प्रेसवार्ता में देवकीनंदन सोन ने बताया कि फिल्म 83 के लिए बनाए गए जूतों को उन्होंने डिजाइन किया है। फिल्म भारत की 1983 विश्व कप की जीत के नायक कपिल देव पर आधारित है। फिल्म के निर्माण में कपिल देव ने सलाहकार की भूमिका भी निभाई। फिल्म के लिए उन्होंने उसी तरह के जूते तैयार कराने को कहा था, जैसे जूते 1983 विश्व कप के दौरान खिलाड़ियों ने पहने थे। प्राेडक्शन कंपनी ने कोलकाता, चेन्नई, पंजाब, दिल्ली, कानपुर में जूतों की तलाश की, लेकिन उन्हें वैसे हैंडमेड जूते नहीं मिले, जो खिलाड़ियों ने विश्व कप के दौरान पहने थे। फिल्म निर्देशक कबीर खान उनके जीवन पर डाक्यूमेंट्री बना चुके हैं, उन्होंने जूते बनवाने को संपर्क किया। सोन ने बताया कि उन्हें लगा कि यह मौका आगरा की दस्तकारी का लोहा मनवाने का है। उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया। फिल्म में भारतीय टीम के अलावा दूसरी टीमों के खिलाड़ी भी उनके डिजाइन किए गए जूते पहने नजर आएंगे। जूते का निर्माण देवकीनंदन के बेटे कबीर नंदन के निर्देशन में जयप्रकाश, लक्ष्मीनारायन, पंचम सिंह, अंसार, छोटू, एजाज, बबलू, निरंजन सिंह ने दिन-रात मेहनत कर किया। उन्होंने आगरा की जूता दस्तकारी का मान रखा है। सोन, पूर्व में सुनील गावस्कर के लिए भी सनी ब्रांड के जूते तैयार कर चुके हैं। अजय देवगन की निर्माणाधीन फिल्म मैदान के लिए भी उनकी कंपनी ने जूते सप्लाई किए हैं।

कभी की थी दो रुपये रोज पर जूतों की पैकिंग

शू डिजाइनर देवकीनंदन सोन को कभी दो रुपये रोज पर जूतों की पैकिंग का काम करना पड़ा था। सोन जब नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके पिता बाबू रामस्वरूप सोन को जूता कारखाना में निरंतर घाटा हुआ। हिम्मत हारकर उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई बंद कराने को मजबूर होना पड़ा। इसके बाद सोन को दो रुपये रोज पर जूते की पैकिंग का काम करना पड़ा। एक दिन अखबार में उन्होंने सेंट्रल फुटवियर ट्रेनिंग सेंटर के एक विज्ञापन को देखा। उसमें शू डिजाइनिंग की ट्रेनिंग लेने पर 75 रुपये महीना प्रोत्साहन राशि के रूप में ट्रेनी को मिलने थे। यह बात अक्टूबर, 1971 की थी। इससे सोन के पिता को उनके उज्जवल भविष्य की आस नजर आने लगी थी। अक्टूबर, 1972 में एक वर्ष की ट्रेनिंग पूरा होने के बाद देवकीनंदन सोन ने 10 वर्ष तक शू एक्सपोर्ट फैक्ट्रियों में शू डिजाइनिंग का काम कर नाम कमाया। 1983 में उन्होंने अपनी कंपनी शू कॉन शुरू की।

मिल चुके हैं दर्जनों पुरस्कार

सोन को उत्कृष्ट शू डिजाइनिंग व आरामदेय दस्तकारी के लिए कई बार पुरस्कार मिल चुका है। सीएफटीआइ ने वर्ष 2020 में सोन को प्राइड आफ सीएफटीआइ से सम्मानित किया था। जिला उद्योग केंद्र ने चर्मकला के लिए मास्टर क्राफ्ट्समैन घोषित किया। आजादी के 50 वर्ष पूरा होने पर वर्ष 1998 में विदेश मंत्रालय द्वारा सोन की जीवनी पर फिल्म निर्देशक कबीर खान से डाक्यूमेंट्री "ए नेशन सेलीब्रेट' तैयार कराई गई थी। जूतों के फैशन के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध इटली की एआरएस कैटलाग में भी उन्हें स्थान मिल चुका है। सोन हस्तनिर्मित मुगल शैली के और पांच फलों की हूबहू आकृति वाले लेडीज शू व बर्फ पर फिसलने से लेकर हवाई कुदान को जेंट्स शू व लैक्मे फैशन वीक के लिए भी जूते बना चुके हैं।

500 वर्ष पुराना है आगरा का जूता उद्योग

आगरा में जूता निर्माण का काम करीब 500 वर्ष पुराना है। मुगल काल में इसकी शुरुआत हुई थी। भारत से दुनियाभर को निर्यात होने वाले जूतों में 28 फीसद हिस्सेदारी आगरा की है। आगरा से यूरोपीय और अमेरिकी देशों को जूते की सप्लाई होती है।

Edited By: Nirlosh Kumar