आगरा, जागरण संवाददाता। कोरोना संक्रमण काल में अस्पतालों में बेड, आक्सीजन और बेहतर इलाज के भले लाख दावे करे, लेकिन निजी अस्पतालों की मनमर्जी मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। ऐसे ही कुछ हुआ काजीपाड़ा निवासी मदन कुमार के साथ। थक-हारकर स्वजन ने उन्हें मथुरा में भर्ती कराया, तो महज नौ घंटे में 49200 का बिल थमा दिया।

तबीयत बिगडऩे पर उनके स्वजन रितेश सोनकर आगरा के आधा दर्जनभर अस्पतालों में भर्ती कराने के लिए जूझते रहे, लेकिन अमित जग्गी, खुराना, एसआर, एससी अग्रवाल, रामरघु, श्रीराम, लोटस, रवि, सरकार, पुष्पांजलि, रेनबो आदि अस्पतालों में से किसी ने भी आक्सीजन वाला बेड देने के लिए हामी नहीं भरी। थक-हारकर वह उन्हें मथुरा स्थित नयति हास्पिटल में ले गए। जहां उन्हें रात आठ बजे भर्ती किया गया, जबकि सुबह पांच बजे उनकी सांसें थम गई। इस पर हास्पिटल प्रशासन ने उन्हें 49200 का बिल बना दिया। नयति हास्पिटल की यह मनमानी आगरा की एक समाजसेवी महिला के लिए भी जानलेवा साबित हुइ है। तमाम संगठनों में सक्रिय रहने कैलाश पुरी निवासी राजकमल जैसवाल की मंगलवार को मौत हो गइ। वे भी नयति हास्पिटल में भर्ती थीं। हास्पिटल प्रबंधन ने उनके परिजनों को बुलाकर पांच लाख जमा करके शव ले जाने की बात कही। जबकि कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए सरकार की ओर से प्राइवेट हास्पिटलों के रेट तय कर दिये गए हैं।  

एंबुलेंस ने लिए 5500 रुपये

उनके साथ मनमानी का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। मथुरा से शव के आगरा लाने के लिए एंबुलेंस वाले ने 5500 रुपये ले लिए। स्वजन का कहना है कि एक तरफ सरकार के आदेश हैं कि अस्पताल वाले मरीज भर्ती करें, लेकिन आगरा में मुख्यमंत्री के आदेश हवा में उड़ाए जा रहे हैं और मरीजों की जान जा रही है। 

 

Edited By: Tanu Gupta