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बांस से भाला फेंक की शुरुआत कर सरनाम सिंह ने जीता स्वर्ण, बनाया था राष्ट्रीय रिकॉर्ड

Published: Thu, 24 Sep 2026 11:21 AM (IST)

भाले की कमी में बांस से अभ्यास कर सरनाम सिंह ने दक्षिण एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 1985 ...और पढ़ें

भाला फेंक में मिले पदकों को दिखाते हुए खिलाड़ी सरनाम सिंह गुर्जर।

भाला फेंक में मिले पदकों को दिखाते हुए खिलाड़ी सरनाम सिंह गुर्जर।

HighLights

  1. भाले के अभाव में बांस से अभ्यास कर की थी शुरुआत।

  2. 1984 में काठमांडू में दक्षिण एशियाई खेलों में जीता स्वर्ण।

  3. 1985 में 78.38 मीटर भाला फेंककर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।

जागरण संवाददाता, आगरा। जापान के आईची प्रांत और उसके मुख्य शहर नागोया में एशियाई खेलों का आयोजन हाे रहा है। वर्ष 1983 में दक्षिण एशियाई खेलों में अइ गांव के सरनाम सिंह ने स्वर्ण जीत नया कीर्तिमान स्थापित किया था।

गांव में अभ्यास के दौरान हाथ में भाला नहीं था, तो बांस ही भाला बना लिया। जुनून था पदक जीतने का और इसी जुनून ने काठमांडू के अंतरराष्ट्रीय खेल मैदान तक पहुंचाया। जनता इंटर कालेज में पढ़ाई के दौरान शुरू हुआ भाला फेंक का यह सफर देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने और रिकार्ड बनाने तक पहुंचा।

राजपूत रेजीमेंट में सिपाही के पद पर हुए भर्ती

सरनाम सिंह पुत्र दीमान सिंह ने स्कूली दिनों में ही भाला फेंकना शुरू कर दिया था। उस समय स्कूल में भाला उपलब्ध नहीं था। ऐसे में उन्होंने बांस को भाले की तरह इस्तेमाल कर अभ्यास किया। यही अभ्यास धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया। 18 सितंबर 1976 को राजपूत रेजीमेंट में सिपाही के पद पर भर्ती होने के बाद भी उनका जुनून कम नहीं हुआ।

सेना की जिम्मेदारियों के बीच वे प्रतिदिन दो से तीन घंटे भाला फेंक का अभ्यास करते थे। मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम सितंबर 1984 में मिला। नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित प्रथम साउथ एशियन गेम्स में 14 देशों के खिलाड़ियों के बीच सरनाम सिंह ने 68 मीटर भाला फेंककर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

इसके बाद वर्ष 1985 में उन्होंने अपनी उपलब्धि को और ऊंचाई दी। उन्होंने गुरुतेज सिंह के 76.74 मीटर के भाला फेंक रिकार्ड को पीछे छोड़ते हुए 78.38 मीटर भाला फेंका और नया रिकार्ड कायम किया।

सिपाही से कैप्टन तक का सैन्य सफर पूरा करने वाले सरनाम सिंह वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त हुए। आज वे अपने गांव अई में ही रहते हैं। कभी संसाधनों के अभाव में बांस को भाला बनाकर अभ्यास करने वाला यह खिलाड़ी आज भी गांव के युवाओं के लिए मेहनत, अनुशासन और जुनून की मिसाल है।