आगरा, प्रभजोत कौर। पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के अभिभावकों को अपना स्टेटस कितना मेंटेन करना पड़ता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। सुबह स्कूल छोड़ते वक्त अलग कपड़े और छुट्टी के समय अलग कपड़े चाहिए। पैरेंट टीचर मीटिंग हो या एनुअल फंक्शन, स्टाइलिश और डिजायनर कपड़ों में नहीं गए तो टीचरों पर इंप्रेशन नहीं पड़ेगा। हर कार्यक्रम में अभिभावक ऐसे तैयार होकर आते हैं, जैसे किसी शादी में जा रहे हों। हाथ के पर्स से लेकर पैरों के सैंडल तक पर नजर होती है। पापा के हाथ में पकड़े मोबाइल से लेकर एसयूवी गाड़ी तक सब कुछ बड़ा मायने रखता है। गाड़ी में ड्राइवर के साथ हैं या खुद चला कर आए हैं, हर बात स्टेटस को घटाती या बढ़ाती है। यही स्टेटस बच्चों के दोस्त और टीचरों की नजर में अहमियत भी तय करता है। फिर चाहे इसके लिए झूठी शान का चोला ही पहनना पड़े...।

यह एडमिशन नहीं आसां

बच्चों का नर्सरी में एडमिशन कराना आसान नहीं रहा। स्कूलों के बनाए नियमों को पूरा करने में माता-पिता की नींद उड़ जाती है। पिछले दिनों शहर में चले मिशन एडमिशन ने हर उस अभिभावक को परेशान किया, जो अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने की चाहत रखता है। बच्चे को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने के लिए 'अपनाÓ घर दिखाना, उसके पैदा होने की रसीद दिखाने से लेकर खुद के पढ़े-लिखे होने का सबूत तक देना पड़ता है। पूरे महीने बचत की चाह रखने वाले अभिभावक स्कूलों की मांग के आगे हार जाते हैं। फॉर्म में लिखना पड़ता है कि महीने का कितना कमाते हैं। इसका सीधा सा मतलब होता है कि स्कूल की फीस भरने में समर्थ हो या नहीं। नौकरी और जिंदगी में न झुकने वाले लोग भी स्कूलों के नियमों के आगे झुक जाते हैं और चुपचाप कागजों को पूरा करते हैं।

अधूरा रह गया सपना

मौसी की बेटी की शादी आने वाली है। लिस्ट और सपने तैयार हैं। अपने लिए साड़ी और तुम्हारे लिए सूट बनवाऊंगी। तुम तो पिछले पांच सालों से हर शादी में यही सूट पहन कर चले जाते हो। अब तो लोग भी बोर हो गए हैं। पति ने थोड़ा सा एतराज जताया, लेकिन दलीलों के आगे चुप हो गया। स्कूल से आते ही बेटे ने डायरी का नोटिस हाथ में थमा दिया। स्कूल के मुखिया के जन्मदिन के लिए पैसे मंगाए हैं। बच्चे डांस करेंगे, जिसके लिए ड्रेस भी इन्हीं पैसों से आएगी। केक, गुब्बारे और तोहफा भी बच्चों के पैसों से ही खरीदे जाएंगे। नोटिस पढ़ते ही सारे सपने और लिस्ट हवा हो गई। शादी के लिए जो पैसे बचाए थे, वो तो अब जन्मदिन में चले जाएंगे। न तो नई साड़ी ही आएगी और न ही पापा नया सूट पहन कर शादी में जा पाएंगे।

कंपीटीशन काफी तगड़ा है

99 प्रतिशत वाले बच्चों का कंपीटीशन 99.99 प्रतिशत वालों से हैं। उनके कंपीटीशन को 98 प्रतिशत वाले भी नहीं समझ पाएंगे। ए और बी ग्रेड में बहुत अंतर होता है। यह ग्रेड बच्चों में तो नहीं पर हां, मम्मियों में जरूर अंतर लाते हैं। 99 प्रतिशत वाले बच्चों की मम्मियों का ग्रुप 98 प्रतिशत वाली मम्मियों से अलग होता है। उनकी किटी पार्टियों में भी उन्हीं को एंट्री मिलती है, जिनके बच्चे टॉपर होते हैं। बच्चों के जन्मदिन पर उसके कौन से दोस्त आएंगे, यह बात दोस्ती नहीं बच्चों के माक्र्स तय करते हैं। बच्चे किसके साथ अपना टिफिन शेयर करेंगे और स्कूल में किसे पीने के लिए पानी देंगे, यह बात भी ग्रेड पर निर्भर है। टॉपर की मम्मियां बी और सी ग्रेड वाले बच्चों की मम्मियों की तरफ देखती भी नहीं हैं। 'थ्री इडियटÓ जैसी फिल्में भी इस मानसिकता को बदल नहीं पाती हैं। 

Posted By: Tanu Gupta

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