आगरा, कुलदीप सिंह। शांत स्वभाव का 11वीं का छात्र कुणाल कुछ महीनों से चिड़चिड़ा हो गया है। घंटों मोबाइल पर समय बिताने में उसका दिन गुजरता है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता है। यह हाल सिर्फ कुणाल का नहीं बल्कि ऐसे युवाओं का संख्या लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया में अधिक सक्रिय रहने की वजह से युवाओं में तनाव बढ़ता जा रहा है। शहर के चिकित्सकों के पास इस तरह के औसतन दो दर्जन से अधिक मरीज हर माह आ रहे हैं। अधिकांश मामलों में उन्हें पता ही नहीं होता कि उनके तनाव में रहने की वजह क्या है? घर, पढ़ाई, नौकरी और गृहस्थी में सबकुछ ठीक होने के बाद भी उन्हें अनचाहा तनाव रहता है। 

मोबाइल के प्रयोग से नुकसान

मोबाइलों में लीड, ब्रोमीन, क्लोरीन, मर्करी और कैडमियम पाया जाता है, जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। मोबाइल में पॉलीक्लोरीनेटेड बाईफिनायल्स रसायन निकलता है, जिसके कारण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घटती है। मोबाइल का प्रयोग करने से लीवर व थाइराइड से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं।

नोमोफोबिया के शिकार हो रहे युवा

मोबाइल का अधिक उपयोग करने वाले लोग नोमोफोबिया के शिकार हो रहे हैं। स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले अगर फोन घर पर भूल जाएं तो उन्हें लगता है कि इसके बगैर क्या होगा। अपनी उपयोगिताओं के अलावा अनजाने में ही लोग मोबाइल फोन की अनुपस्थिति में असहज होने लगते हैं।

क्या है नोमोफोबिया

स्मार्टफोन की लत को नोमोफोबिया कहते हैं। ये इस बात का फोबिया (डर) है कि कहीं आपका फोन खो न जाए या आपको उसके बिना न रहना पड़े। इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को 'नोमोफोबÓ कहा जाता है। दुनियाभर में हुए एक सर्वे में 84 फीसदी स्मार्टफोन उपभोक्ताओं ने स्वीकार किया कि वे एक दिन भी अपने फोन के बिना नहीं रह सकते हैं। स्मार्टफोन की इस लत यानि नोमोफोबिया हमारे शरीर के साथ-साथ हमारे दिमागी सेहत को भी प्रभावित करता है।

फेफड़ों पर असर

झुकी गर्दन की वजह से शरीर को पूरी या गहरी सांस लेने में समस्या होती है। इसका सीधा असर फेफड़ों पर पड़ता है।

टेक्स्ट नेक

मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखनेवाले लोगों को गर्दन के दर्द की शिकायत आम हो चली है। इसे 'टेक्स्ट नेक का नाम दे दिया गया है। यह समस्या लगातार टेक्स्ट मैसेज भेजने वालों और वेब ब्राउजिंग करने वालों में पाई जाती है।

हो सकती है किडनी फेल

75 फीसदी लोग अपने मोबाइल को बाथरूम में ले जाते हैं, जिससे हर 6 में से 1 फोन पर ई-कोलाई बैक्टीरिया के पाए जाने की आशंका बढ़ जाती है। इस बैक्टीरिया की वजह से डायरिया और किडनी फेल होने की आशंका होती है।

मोबाइल ने छीनी नींद

दो घंटे तक चेहरे पर लगातार मोबाइल की रोशनी पडऩे से 22 फीसदी तक मेलाटोनिन कम हो जाता है। इससे नींद आने में मुश्किल होती है। यानी ज्यादा देर तक मोबाइल देखने से नींद नहीं आने की समस्या हो सकती है। सर्वे में 12 फीसदी लोगों ने कहा कि स्मार्टफोन का ज्यादा उपयोग करने से उनके निजी संबंधों पर सीधा असर पड़ा है।

सोशल मीडिया इस्तेमाल

इंटरनेट-50.3 फीसद

फेसबुक 21.5 फीसद

वाट्सएप 18.4 फीसद

ट्विटर 3.7 फीसद

इंस्टाग्राम 2.3 फीसद

विशेषज्ञ की राय

मोबाइल का अधिक उपयोग युवाओं को बीमार कर रहा है। युवाओं में तनाव की प्रमुख वजह मोबाइल है। रोजाना एक घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताने वाले अधिकांश लोग नोमोफोबिया की गिरफ्त में रहते हैं।

विवेक पाठक, साइकोथेरेपिस्ट

आगरा मोबाइल नामा

जिला की जनसंख्या (वर्ष 2011 के अनुसार)-4418787

जिला जनसंख्या अनुमानित(वर्ष 2019)-51 लाख

आगरा शहर की जनसंख्या (वर्ष 2011 के अनुसार)-1587704

आगरा शहर की जनसंख्या (वर्ष 2019)-20 लाख

वेस्ट यूपी में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अनुसार फरवरी 2019 तक मोबाइलधारक व

टेलीफोन धारक

- 64703517, 267109

आगरा जिला में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अनुसार फरवरी 2019 तक मोबाइलधारक व टेलीफोन धारक

- 48 लाख व 84 हजार

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Posted By: Tanu Gupta

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