आगरा, जागरण संवाददाता। गर्भ में 10 में से एक शिशु की जान को खतरा है। गर्भस्थ शिशु का विकास सही तरह से नहीं हो रहा है, यह 13 से 15 सप्ताह के बीच पता चल जाए तो शिशु की जान बच सकती है। इसे लेकर शानिवार से होटल कोर्टयार्ड बाई मैरिएट, फतेहाबाद रोड पर शुरू हुई दो दिवसीय इंडियन रेडियोलॉजिकल एंड इमेजिंग एसोसिएशन (आइआरआइए,

यूपी चैप्टर) की 33वीं कार्यशाला रीकॉन में आइआरआइए के पूर्व अध्यक्ष डॉ भूपेंद्र आहूजा ने बताया कि अल्ट्रासाउंड में जन्मजात विकृति देखी जा रही हैं, यह 100 में एक शिशु में है। वहीं, 10 में से एक गर्भस्थ शिशु का विकास धीमी गति से हो रहा है। इसे अल्ट्रासाउंड में देखा जा सकता है, इसके लिए आइआरआइए द्वारा संरक्षण अभियान भी शुरू किया गया है, जिससे 13 से 18 सप्ताह में गर्भस्थ शिशु की ग्रोथ कम हो रही है यह पता चल जाए। इलाज से शिशु की जान बच सकती है। डॉ. वनज माथुर ने ओवेरियन एवं ट्यूबल फैक्टर पर व्याख्यान दिया। डॉ. गौरव अग्रवाल, महिलाओं में एंडोमेट्रोइसिस की समस्या की जांच और इलाज पर चर्चा की। कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य अतिथि सर गंगाराम इंस्टीट्यूट के डॉ. टीबीएस बख्शी ने किया, डॉ. कर्नल आरएन बग्गा, आइआरआइए के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद खालिद, डॉ. केके पांडे, आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अजय बुलागन, सचिव डॉ. एके अरोरा, डॉ. अरविन्द गुप्ता, डॉ. अंजलि गुप्ता, डॉ. हिमाशु मौजूद रहे, संचालक डॉ. पंकज नगाइच ने किया। अल्ट्रासाउंड कारगर, एमआइआइ पर हो रहा खर्चा

डॉ. मोहम्मद खालिद ने बताया कि एमआरआइ और सीटी स्कैन कराए जाते हैं। मगर, 99 फीसद बीमारिया अल्ट्रासाउंड से डायग्नोज हो सकती हैं। इसके लिए नियमों में बदलाव होना चाहिए।

Posted By: Jagran

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