आगरा, जागरण संवाददाता। बच्चों से लेकर बुजुर्गों में ब्रेन अटैक (ब्रेन स्ट्रोक, पक्षाघाल, लकवा) के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसका एक बड़ा कारण खून का गाढ़ा ब्लड कोएग्युलेशन होना है। कोरोना काल के बाद से यह और बढ़ा है। इसके साथ ही बालकनी से गिरने से बच्चों की जान जा रही है। इन दोनों को रोका जा सकता है।

सिर की चोट को लेकर किया जागरूक

न्यूरोलाजिकल सोसायटी आफ इंडिया के 70 वें अधिवेशन में बुधवार को पहले दिन न्यूरोसर्जन ने जन जागरण गोष्ठी में ब्रेन अटैक, अंगदान और बच्चों की सिर की चोट को लेकर जागरूक किया गया।

डा. आरसी मिश्रा ने दी जानकारी

वरिष्ठ न्यूरोसर्जन व आयोजन अध्यक्ष डा. आरसी मिश्रा ने कहा कि हार्ट अटैक की तरह से ही ब्रेन अटैक पड़ता है। दिमाग में खून की नकिला में रुकावट और फट जाने से रक्तस्राव होने पर अटैक पड़ जाता है। अटैक के बाद दिमाग के जिस हिस्से में खून नहीं पहुंचता है वह हिस्सा काम करना बंद कर देता है। इसके बाद लक्षण आने लगते हैं। शराब, तंबाकू का अधिक सेवन, कोरोना काल के बाद खून के गाढ़ा होने, हाई ब्लड प्रेशर, मधुमेह, कालेस्ट्राल का स्तर बढ़ने के कारण ब्रेन अटैक के मामले बढ़े हैं।

अटैक में हो जाता है दिमाग का हिस्सा खराब

डा. वाईआर यादव, पीजीआइ चंडीगढ़ ने बताया कि अटैक में दिमाग का जो हिस्सा खराब हो जाता है वह ठीक नहीं होता है। आयोजन सचिव डाॅ. अरविंद कुमार अग्रवाल ने बताया कि ब्रेन अटैक पड़ने पर सबसे पहले सीटी स्कैन करना चाहिए। चाढ़े चार घंटे गोल्डन पीरियड होता है, इस दौरान एक इंजेक्शन लगाया जाता है, इससे मरीज पूरी तरह से ठीक हो जाता है। मगर, 99 प्रतिशत मरीज पांच घंटे के बाद पहुंचते हैं।

एम्स दिल्ली के न्यूरो क्रिटिकल केयर यूनिट में प्रोफेसर डा. दीपक गुप्ता ने बताया कि दो वर्ष तक के बच्चों में सिर की चोट के मामले बढ़े हैं। इसे रोका जा सकता है, बच्चा सबसे पहले चढ़ना शुरू करता है। वह बालकनी तक पहुंच जाता है, एक से दो वर्ष तक के बच्चों में सबसे ज्यादा सिर की चोट बालकनी से गिरने से लग रही है। इससे बच्चों की जान जा रही है। डा. अरुण सिंह, डा. आलोक अग्रवाल, डा. संजय गुप्ता आदि मौजूद रहे।

तीन पीढ़ियों को तबाह कर रहा ब्रेन अटैक

ब्रेन अटैक तीन पीढ़ियों को तबाह कर रहा है। ब्रेन अटैक के बाद जान बचाना मुश्किल होता है। जिन मरीजों की जान बच जाती है उनमें दिव्यांगता आ जाती है और कोई काम नहीं कर पाते हैं। अब 35 से 40 की उम्र में भी ब्रेन अटैक के मामले बढ़ रहे हैं, यही उम्र काम करने की होती है।

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अंगदान करें, 18 महीने के बच्चे ने बचाई आठ की जान

न्यूरोसर्जन डा. दीपक गुप्ता ने बताया कि अंगदान से आठ लोगों की जान बचाई जा सकती है। 18 महीने के बच्चे के अंगदान से आठ बच्चों की जान बच गई। उन्होंने बताया कि मौत होने के बाद शरीर से आभूषण उतार लिए जाते हैं, क्योंकि ये साथ नहीं जाते। इसी तरह से अंग अमूल्य हैं, लिवर, गुर्दा, हार्ट, आंख दान करने से कई मरीजों की जान बचाई जा सकती है। इसके लिए न्यूरोसर्जन को भी आगे आना चाहिए।

 

Edited By: Abhishek Saxena

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