हरिभजन करने से क्षीण हो जाते हैं बड़े से बड़े पाप, आगरा में मोरारी बापू की राम कथा का समापन
मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा का आगरा में समापन हुआ, जिसमें उन्होंने हरिभजन से पापों के क्षीण होने और ...और पढ़ें

आगरा में राम कथा सुनाते मोरारी बापू।
HighLights
हरिभजन से प्रबल दोष और तीव्र पाप क्षीण हो जाते हैं।
साधुता पद नहीं, स्वभाव है; नेत्रों में करुणा परम साधुता।
जागरण संवाददाता, आगरा। हरिभजन करते-करते प्रबल दोष और तीव्र पाप भी क्षीण हो जाते हैं। जिसके अवगुण भजन से स्वयं मिटें, वह ऋषि भाव की ओर बढ़ता है। मानस में हनुमानजी सेवा-परायण साधु हैं, भरतजी त्याग के आदर्श। साधुता पद नहीं, स्वभाव है। सबल होकर भी सरल रहना और नेत्रों में करुणा रखना परम साधुता है।
रामकथा किसी संप्रदाय की नहीं, पूरे जग की कथा है। पहले श्रवण जरूरी है, फिर पाठ। श्रवण से प्रीति जन्मती है। ये विचार रामकथा में मोरारी बापू ने व्यक्त किए। बापू की रामकथा का नवें दिन बुधवार को समापन हो गया।
करुणानिधान परिवार की ओर से फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड पर चल रही नौ दिवसीय श्रीरामकथा के पंडाल में श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ रही। कथा का आरंभ ऋषि-मुनियों को प्रणाम से हुआ। बापू ने संतों के प्रति श्रद्धा रखने और किसी साधु अथवा देव परंपरा की निंदा से बचने को कहा। भक्ति और साधु-प्रेम भीतर परिवर्तन लाते हैं।
गुरु जीवन को दिशा देने वाली शक्ति है। युवावस्था में गुरु की शरण लेनी चाहिए। ऋषि पंचमी के साथ लाभ, विवाह, वसंत, रंग, श्री, नाग और ललिता पंचमी का जिक्र किया। तिथियां केवल तारीखें नहीं, साधना और संस्कार के अवसर हैं। कथा में अन्न वितरण होना चाहिए।
गुरु नानक की पंगत-संगत और सिख लंगर का स्मरण करते हुए भजन करो और भोजन करो। चित्रकूट को प्रेम की नगरी भी कहा जा सकता है। दशरथ प्रसंग पर बोले कि दर्पण में स्वयं को देखकर समय पहचानें। सफेद बाल दिखें तो संतान को परिवार और कारोबार की जिम्मेदारी सौंप दें, अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। वचनबद्धता के कारण वनवास मिला।
श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन गए। भरत चित्रकूट पहुंचे, पर श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा निभाई। भरत ने खड़ाऊं स्वीकार कर नंदीग्राम से राज्य चलाया। उनका त्याग सहज था। आगे शूर्पणखा प्रसंग, बाली-सुग्रीव युद्ध और राम-सुग्रीव मैत्री आई।
शक्ति भूल जाने पर जामवंतजी ने हनुमानजी को सामर्थ्य याद दिलाई। मनुष्य अक्सर अपनी शक्ति भूल जाता है, तब गुरु उसके स्वरूप का बोध कराते हैं। हनुमानजी समुद्र लांघकर लंका पहुंचे।
विभीषण से भेंट के बाद अशोक वाटिका में माता सीता को श्रीराम की मुद्रिका दी। लंका जलाना मूल उद्देश्य नहीं था, आगे ऐसी स्थिति बनी कि लंका दहन हुआ। हनुमानजी चूड़ामणि लेकर लौटे।
