संत मोरारी बापू ने कहा साधु पद नहीं, आंतरिक स्वभाव; आगरा में श्रीराम-सीता विवाह प्रसंग ने भक्तों को किया भावविभोर
संत मोरारी बापू ने आगरा में श्रीरामकथा के सातवें दिन बताया कि साधु होना पद नहीं, आंतरिक स्वभाव है, जो सरलता और संतोष में जीता है।

जागरण संवाददाता, आगरा। साधु होना किसी पद या बाहरी क्रिया का नाम नहीं, यह भीतर के स्वभाव का परिचायक है। संत मोरारी बापू ने शनिवार को फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में आयोजित श्रीरामकथा के सातवें दिन यह विचार व्यक्त किए। करुणानिधान परिवार द्वारा आयोजित कथा में साधुता, त्याग, विवेक, धैर्य, रामनाम और स्वाध्याय से लेकर श्रीराम-सीता विवाह तक के प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भक्ति के सागर में डुबो दिया।
संत मोरारी बापू ने कहा कि साधु का अर्थ सरलता है, जिसमें कुटिलता नहीं होती और जो संतोष में जीता है। उन्होंने कहा कि जिसने रामनाम पकड़ लिया, उसे अपनी अस्मिता गिरने नहीं देनी चाहिए। त्याग के माध्यम से ही मनुष्य के भीतर वास्तविक प्रकाश का निर्माण होता है। विवेक और धैर्य की असली परीक्षा आपातकाल में होती है। संकट के समय जो व्यक्ति अपने विवेक और धैर्य को बनाए रखता है, वही साधना की कसौटी पर खरा उतरता है।
कथा आयोजन को लेकर चल रही भ्रांतियों पर बापू ने स्पष्ट किया कि उनकी कथा करवाने के लिए कोई निश्चित रकम नहीं देनी पड़ती। उन्होंने कहा कि मानस अमूल्य है और इसे धन के मूल्य से नहीं बांधा जाना चाहिए। सत्य की साधना प्राप्त किए बिना कोई ऋषित्व की ओर नहीं बढ़ सकता।
रिश्वत लेने वाला ही नहीं, देने वाला भी जिम्मेदार
सामाजिक जीवन में ईमानदारी का संदेश देते हुए बापू ने रिश्वत लेने और देने दोनों को अनुचित बताया। कहा, गलत काम में केवल लेने वाले की भूमिका नहीं, देने वाला भी उतना ही दोषी है। उन्होंने मंदिर में दर्शन और घर में धर्म के बीच का अंतर भी समझाया। कहा, धर्म की असली परीक्षा घर लौटने के बाद होती है, जहां परिवार में प्रेम और सद्भाव होना आवश्यक है।
श्रीराम जन्म से विवाह प्रसंग तक बही भक्ति की धारा
श्रीराम जन्म के प्रसंग पर कहा, राम जन्म के आनंद में मानो सूर्य भी अपनी गति भूल गया। दशरथ के चार पुत्रों के नामकरण की आध्यात्मिक व्याख्या की कि श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, और शत्रुघ्न सिर्फ चार पुत्र नहीं, चार वेदों के सूत्र हैं। अभिभावक बच्चों में संस्कार डालें। जनकपुर पहुंचने पर राजा जनक द्वारा श्रीराम के दर्शन का प्रसंग कथा का विशेष आकर्षण रहा।
बापू ने कहा कि जनक परम वैरागी थे, लेकिन श्रीराम को देखते ही उनका वैराग्य अनुराग में बदल गया। श्रीराम-सीता के प्रथम दर्शन, सीता की पार्वती आराधना, जनक की प्रतिज्ञा और शिवधनुष भंग के प्रसंग ने कथा को चरम भाव तक पहुंचाया। विवाह पंचमी के मंगल प्रसंग में जनकपुर आनंद से भर उठा।
