आगरा [विनीत मिश्र]। बीहड़ का यह इलाका है, जहां प्यासी धरती ने आंखों का पानी भी सुखा दिया है। पाताल में और गहरे खिसकते पानी ने सारे सपने तोड़ दिए। राजस्थान व मध्य प्रदेश की सीमा पर बसे बीहड़ के इन क्षेत्र में नाउम्मीदी का डेरा है। यहां पानी नहीं है तो बेटों के रिश्ते भी नहीं आते।

लड़कों को दूसरे राज्यों से दहेज देकर बहू लानी पड़ रही है। लड़कियों की भी शादी मुश्किल से ही हो पाती है। कोई रिश्तेदार आता है तो उसे कोल्ड ड्रिंक पिलाई जाती है, क्योंकि उन्हें यहां का पानी अच्छा ही नहीं लगता है।

आगरा के पिनाहट ब्लॉक की ग्राम पंचायत रेहा। चंबल नदी किनारे बसे उत्तर प्रदेश की सीमा के इस आखिरी गांव के एक छोर पर राजस्थान की सीमा है, तो दूसरे पर मध्य प्रदेश की। तीन राज्यों के बीच बसे इस गांव में उम्मीदें पानी के साथ पाताल में समा रही हैं। इस ग्राम पंचायत में 15 मजरे हैं। यहां गिरते भूजल स्तर के बीच पानी इतना खारा है कि पीना मुश्किल हो जाता है।

हैंडपंप दगा दे गए हैैं। थोड़ा बहुत पानी दे रहे एकमात्र हैंडपंप पर तीन सौ की आबादी निर्भर है। गांव के बुजुर्ग उमाचरण, रामेश्वर, प्रीतम सिंह, सत्यभान और मुन्नालाल बताते हैं कि हैंडपंप के पानी से बर्तन धोए जाते हैं। पीने का पानी पास में बह रही चंबल नदी से लाना पड़ता है। पानी के संकट से बदरंग हो चुके गांव की एक स्याह तस्वीर और भी है। यहां से रिश्तों ने भी मुंह मोड़ लिया। 300 की आबादी में गुड्डू, बबलू, विष्णु, लोकेंद्र, धर्मेंद्र, रामऔतार, लाखन, सुग्रीव सहित करीब 33 ऐसे अविवाहित अधेड़ हैं, जिनकी शादी की उम्र (40 वर्ष से अधिक) निकल चुकी है।

ग्रामीण ये कहने में कतई संकोच नहीं करते कि लोग अपनी बेटी इसलिए यहां नहीं ब्याहते कि उसे भी पानी का संकट झेलना पड़ेगा। इससे भी भयावह तस्वीर ये कि यहां जिनकी शादी हुई है, उनमें ज्यादातर बहू 'खरीदकर' लाए हैं। जो संपन्न नहीं हैं, वो अविवाहित ही रह गए। पानी के संकट के कारण कई लोग परिवार समेत दूसरे कस्बे या फिर राजस्थान और मध्य प्रदेश को पलायन कर गए। 

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Posted By: Dharmendra Pandey

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