आगरा, अजय शुक्‍ला। आम तौर पर, हम जिस शहर में रहते हैं उसे महसूस तो करते हैं, पर पहचानते नहीं। यही वजह है कि वक्त के साथ शहर की पहचान पर जमती धूल और इसके मूर्त प्रतीकों को लगती लालच की खरोंच भी नहीं देख पाते। बीते दिनों कई विदेशी पर्यटक 'लपकों' द्वारा फतेहपुर सीकरी में ठगे गए। मामला सोशल मीडिया पर बहस का विषय बना। अंकुश लगाने के प्रयास हुए, लगा भी। हमने यह जानने की कोशिश की कि क्या है फतेहपुर सीकरी का गौरवशाली इतिहास और उसकी मौजूदा सूरते हाल।

फतेहपुरी सीकरी में हजरत शेख सलीम चिश्ती की दरगाह के बादशाही दरवाजे से निकलकर हम जैसे ही किले की तरफ मुड़े कि चार-पांच बच्चों ने घेर लिया- 'दस रुपये दे दो, सर जी।' मेरा गाइड और साथी आगे पहुंच चुके थे। उन्हीं की ओर बढ़ते कदम थमे। पूछा- क्यों दे दें, क्या करोगे दस रुपये का? थोड़ा तल्खी से पूछे गए सवाल से अचकचाकर बाकी बच्चे खिसक लिये पर एक सात साल का बच्चा रुका रहा- 'पांच रुपये ही दे दो सरजी, कहो तो शायरी सुना दें।'

अजीबो-गरीब आफर था, लेकिन नन्हे उस्ताद से शायरी सुनने की ललक और बच्चे के मासूम आग्रह ने रोक लिया। 'ओह! तो शायर भी हो, अच्छा सुनाओ।' बच्चे ने धाराप्रवाह शुरू कर दिया - हर मोड़ पर बादे वफाए कभी काम नहीं आते हैं/ और टूटे हुए प्याले में कभी जाम नहीं आते हैं ... हसीन लड़की दिल तोडऩा तो सोच समझके / टूटे हुए दिल कभी काम नहीं आते ... गरम - गरम जलेबियों से रस टपकता है / सर जी की याद में मैडम जी का दिल धड़कता है ... यह वाकिंग मुशायरा तब तक जारी रहा जब तक आसपास के लोगों ने बच्चे को सतर्क और मैंने जेब से दस का नोट निकालकर बच्चे को नज्र नहीं कर दिया। पूछतांछ में पता चला बच्चे का नाम जुनैद है और उसके पिता वहीं माल बेचते हैं, लेकिन धंधा अभी मंदा चल रहा। कारण, पुलिस ने अंकुश लगा दिया है।

यहां आई एक ट्रेनी एएसपी ने पर्यटकों के साथ आये दिन हो रही बदसलूकी की शिकायतों के बाद सख्ती की। लपकों पर तो अंकुश लगाया ही दरगाह के बाहर सौ मीटर तक प्रतिबंधित क्षेत्र में मार्बल के सामान, फूल, अगरबत्ती आदि बेचने वालों को भी खदेड़ दिया है। ये दरगाह तक अतिक्रमण कर लेते हैं। इन्हीं के बीच लपके भी सक्रिय रहते हैं, कभी दुकानदार, कभी गाइड और कभी दलाल के रूप में। करीब डेढ़ महीने पहले एक लपके ने पर्यटक को पांच से पचास रुपये में बिकने वाली चादर 25 हजार रुपये में चिपका दी। यह तो लपकागीरी का एक नमूना है, कारनामे और भी हैं।

एक स्थानीय युवक ने बताया कि पुलिसिया अंकुश के बाद लपके गायब हैं। ट्रेनी एएसपी ने चार-पांच सिपाही दरगाह पर तैनात कर दिये हैं। इसलिए लपकों ने ठिकाना बदल दिया है। करीब साढ़े चार सौ लपके सक्रिय हैं। आठ-दस बुलंद दरवाजे के पास बैठे रहते हैं। 30-40 बादशाही गेट के पास सक्रिय हैं। सौ से डेढ़-दो सौ तक आगरा गेट के बाहर और बाकी टूरिस्ट वाहनों की पार्किंग के पास सक्रिय रहते हैं। पुलिस को देखकर भाग लेते हैं। आमदनी बंद होने पर अब ये छोटे-छोटे बच्चे शायरी सुनाकर कमाई कर रहे हैं। पूछने पर जुनैद ने बताया कि ऐसी शायरी गाइड लोगों को सुनकर सीखी है। दरअसल, अधिकतर नॉन अप्रूव्ड गाइड जो लपकागीरी में भी संलग्न हैं, वह युवा जोड़ों को ठगी का शिकार बनाने के पहले इसी तरह की बेसिर पैर वाली शायरी सुनाकर करीबी हासिल करते हैं। मनचाहा इतिहास और तथ्य बताकर गलत जानकारी देते हैं ...नन्हा जुनैद उनसे यही कला सीख रहा।

शरीफ लपकों की कमाई भी कुछ कम नहीं

तहजीब तो यही कहती है कि जब कोई मेहमान (पर्यटक) हमारे शहर में आये तो उसे अपनी गौरवशाली परंपराओं की अनुभूति कराते हुए आत्मीयता, रहबरी और एहतिराम के साथ पेश आयें। फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती की दरगाह पर जियारत के इरादे से या बादशाह अकबर के गुरु की रूह महसूस करने आने वाले पर्यटकों को इसके विपरीत अहसास से रूबरू होना पड़ता है। कभी हंसी आती है और तरस भी।

शाही दरवाजे से चिश्ती की दरगाह में दाखिल हो रहे एक विदेशी पर्यटक को कुछ शरीफ लपकेज् कमर के नीचे तहमद की तरह चादर पहनाते नजर आये। मैं चौंका, पर्यटक भी कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह शरीफ आदमी उसे चादर पहनाने में मशरूफ था।

मामला समझने की कोशिश की। पता चला कि दरगाह में जाने वालों को घुटने ढककर जाना होता है, अन्यथा यह बाबा की शान में गुस्ताखी मानी जाती है। दरगाह में एक बोर्ड टंगा है जिसमें यह हिदायत लिखी है। दिक्कत यह है कि ज्यादातर विदेशी पर्यटक घुटने के ऊपर खत्म हो जाने वाली नेकर या बरमूडा पहनकर ही इस गर्म जलवायु वाले देश में घूमते हैं। जब दरगाह से लौटते हैं तो चादर की वापसी के साथ बख्शीश-दक्षिणा की उम्मीद स्वाभाविक तौर पर रहती है। श्रद्धा से दे दिया तो ठीक नहीं तो सामने वाले की पर्सनालिटी तोलकर फीस बता दी। चादर की असल कीमत से ज्यादा। चादर फिर अगले कस्टमर के घुटने घूरने और ढकने के लिए बेताब नजर आती है।

गर्मी के दिनों में बाबा चिश्ती की दरगाह पर रोजाना पांच हजार के करीब पर्यटक आते हैं, ज्यादातर विदेशी। पांच से पचास रुपये तक वाली चादर के सेवा कारोबार और कमाई का अंदाजा आप खुद लगा लें। यह भी बता दें कि यह चादर एक दिन में खत्म नहीं हो जाती। सालों नहीं, तो महीनों धुलाई-सफाई के बाद कमाई के लिए तैयार रहती है। कुछ यही होता है दरगाह में पहन कर जाई जाने वाली कपड़े की चप्पल और दरगाह के भीतर मजार शरीफ में पहनी जाने वाली टोपी के साथ। इनकी कमाई भी चादर से होड़ लेती है।

लपके भी कहीं शरीफ होते हैं!

किसी के मन में सवाल आ सकता है कि लपके कब से शरीफ हो गए। मुतमइन हो लें कि शरीफ लपकेज् होते हैं। चिश्ती बाबा की शान में गुस्ताखी हो यह कतई मंजूर नहीं। जो परंपरा है, उसे निभाना पड़ेगा। इसमें हर्ज भी नहीं। उसूलन, होना यह चाहिए कि चादर, टोपी, चप्पल या दूसरी चीजों का एक दाम तय कर पर्यटकों को उपलब्ध करा दी जानी चाहिए और उन्हें यह यादगार या बाबा के आशीर्वाद के तौर पर सौंप देनी चाहिए। इसमें सिर्फ शराफत होगी, लपकागीरी नहीं। लेकिन, जब परंपरा का कारोबार होने लगे, मनमाने तरीके से, पर्यटक को कुछ मिलेगा भी नहीं, तो फिर यह लपकागीरी ही हुई। चूंकि यह काम व्यवस्था से जुड़े लोगों की सरपरस्ती में होता है तो उनकी शराफत पर सवाल उठाना थोड़ा मुश्किल है। दरअसल, लालच पनपने और उसे पर्यटकों के साथ लूट में तब्दील होने की यह पहली कड़ी है।

शरीफ लपकों की कमाई भी कुछ कम नहीं

तहजीब तो यही कहती है कि जब कोई मेहमान (पर्यटक) हमारे शहर में आये तो उसे अपनी गौरवशाली परंपराओं की अनुभूति कराते हुए आत्मीयता, रहबरी और एहतिराम के साथ पेश आयें। फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती की दरगाह पर जियारत के इरादे से या बादशाह अकबर के गुरु की रूह महसूस करने आने वाले पर्यटकों को इसके विपरीत अहसास से रूबरू होना पड़ता है। कभी हंसी आती है और तरस भी।

शाही दरवाजे से चिश्ती की दरगाह में दाखिल हो रहे एक विदेशी पर्यटक को कुछ शरीफ लपकेज् कमर के नीचे तहमद की तरह चादर पहनाते नजर आये। मैं चौंका, पर्यटक भी कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह शरीफ आदमी उसे चादर पहनाने में मशरूफ था।

मामला समझने की कोशिश की। पता चला कि दरगाह में जाने वालों को घुटने ढककर जाना होता है, अन्यथा यह बाबा की शान में गुस्ताखी मानी जाती है। दरगाह में एक बोर्ड टंगा है जिसमें यह हिदायत लिखी है। दिक्कत यह है कि ज्यादातर विदेशी पर्यटक घुटने के ऊपर खत्म हो जाने वाली नेकर या बरमूडा पहनकर ही इस गर्म जलवायु वाले देश में घूमते हैं। जब दरगाह से लौटते हैं तो चादर की वापसी के साथ बख्शीश-दक्षिणा की उम्मीद स्वाभाविक तौर पर रहती है। श्रद्धा से दे दिया तो ठीक नहीं तो सामने वाले की पर्सनालिटी तोलकर फीस बता दी। चादर की असल कीमत से ज्यादा। चादर फिर अगले कस्टमर के घुटने घूरने और ढकने के लिए बेताब नजर आती है।

गर्मी के दिनों में बाबा चिश्ती की दरगाह पर रोजाना पांच हजार के करीब पर्यटक आते हैं, ज्यादातर विदेशी। पांच से पचास रुपये तक वाली चादर के सेवा कारोबार और कमाई का अंदाजा आप खुद लगा लें। यह भी बता दें कि यह चादर एक दिन में खत्म नहीं हो जाती। सालों नहीं, तो महीनों धुलाई-सफाई के बाद कमाई के लिए तैयार रहती है। कुछ यही होता है दरगाह में पहन कर जाई जाने वाली कपड़े की चप्पल और दरगाह के भीतर मजार शरीफ में पहनी जाने वाली टोपी के साथ। इनकी कमाई भी चादर से होड़ लेती है।

लपके भी कहीं शरीफ होते हैं

किसी के मन में सवाल आ सकता है कि लपके कब से शरीफ हो गए। मुतमइन हो लें कि शरीफ लपकेज् होते हैं। चिश्ती बाबा की शान में गुस्ताखी हो यह कतई मंजूर नहीं। जो परंपरा है, उसे निभाना पड़ेगा। इसमें हर्ज भी नहीं। उसूलन, होना यह चाहिए कि चादर, टोपी, चप्पल या दूसरी चीजों का एक दाम तय कर पर्यटकों को उपलब्ध करा दी जानी चाहिए और उन्हें यह यादगार या बाबा के आशीर्वाद के तौर पर सौंप देनी चाहिए। इसमें सिर्फ शराफत होगी, लपकागीरी नहीं। लेकिन, जब परंपरा का कारोबार होने लगे, मनमाने तरीके से, पर्यटक को कुछ मिलेगा भी नहीं, तो फिर यह लपकागीरी ही हुई। चूंकि यह काम व्यवस्था से जुड़े लोगों की सरपरस्ती में होता है तो उनकी शराफत पर सवाल उठाना थोड़ा मुश्किल है। दरअसल, लालच पनपने और उसे पर्यटकों के साथ लूट में तब्दील होने की यह पहली कड़ी है।

 

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Posted By: Tanu Gupta

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