आगरा, तनु गुप्‍ता। श्राद्ध पक्ष के पवित्र दिन चल रहे हैं। घर- घर में महिलाएं पितरों की रुचि के अनुसार भोजन बनाती हैं और पुरुष अपने पितृ को तृप्‍त करने के लिए तर्पण करते हैं लेकिन कई बार सवाल उठता है कि घर के पुरुष ही क्‍यों। यह प्रश्‍न कई बार बराबरी की सोच वाली पीढ़ी के मन मस्तिष्‍क में उठता है। इस बाबत धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी ने पुराणों में वर्णित महत्‍व को साझा किया।

पंडित वैभव ने बताया कि पुत्र-पौत्रों के लिए अपने पितरों का श्राद्ध कर्म क्यों जरुरी है?--यह अनूठा रहस्य हर किसी मनुष्य को जानना चाहिए। यह रहस्य उन लोगों को भी जानना चाहिए जो इस श्राद्धकर्म का विरोध समय-समय पर करते रहते हैं ताकि वे अपनी भूल सुधार कर सकें और अपने पितृ-ऋण से अपने आपको मुक्त कर सकें।

धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी

धर्म के चार अंग और श्राद्ध

पंडति वैभव के अनुसार धर्म के चार प्रमुख अंग हैं वेद, स्मृति, सदाचार और अनुकूलता। चारों अंग ज्ञान को व्यवहारिक जगत में मनुष्य के दैनिक आचरण से गूंथते रहते है। निरंतरता (सना-तनता) धर्म का मूल गुण है और इसी के अंतर्गत मनुष्य को अपने आपको अपनी तीन परिवर्ती (पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र) और तीन पूर्ववर्ती (पिता, पितामह और प्रपितामह) पीढ़ियों के साथ एक पिण्ड का भागीदार माना गया है। श्राद्ध के अनुष्ठान् में श्राद्धकर्ता श्रद्धा पूर्वक बुद्धि और स्मृति को ठोस भौतिक आचार से जोड़ कर अपने पहले की तीन पूर्ववर्ती पीढ़ियों के सुक्ष्म शरीर धारी पितरों को अन्न से बना पिण्ड देता है। साथ ही उस पिण्ड को सूंघ कर सूक्ष्मरूप में स्वयं भी आत्मसात् करता है और प्रार्थना करता है कि इस क्रिया से उसकी आने वाली ( परिवर्ती) पीढियां भी समृद्ध, कर्मठ और बुद्धिमान बनें। इस तरह से श्राद्ध की क्रिया भौतिक अनुष्ठान की स्मृति तथा ज्ञान से और कर्ता के वर्तमान को अतीत और भविष्य से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण सेतु बन जाती है।

हमारे मृत पूर्ववर्ती जन जो पितर बन चुके हैं, उनको हम स्थूल इन्द्रियों से नहीं, सूक्ष्म बुद्धि से जानते हैं और अनुभव करते हैं। यह माना जाता है कि हमारे शरीर के कोशों के रूप में हमारे पास अभी भी बने हुए हैं। उनका स्थूल शरीर भले ही नष्ट हो गया हो लेकिन उनके पुत्र-पौत्रों के शरीरों के कोशों के रूप में वे आज भी भौतिक रूप में जीवित हैं। उनकी सन्तान उनके भाव शरीर का स्मरण करती है और श्राद्ध उपरान्त उनकी तथा आनेवाली पीढ़ियों की तृप्ति की कामना करती है ताकि हमारा गोत्र बढे, हमें सुख-समृद्धि देने वाले देवता बढ़ें, वेद रूप ज्ञान की वृद्धि हो, सन्तान की वृद्धि हो, श्राद्ध हमसे कभी अलग न हो, हमारे पास दान देने के लिए प्रचुर सामग्री हो और अतिथि सत्कार का लाभ हमें मिलता रहे। लोग हमसे मांगें, हमें लोगों से मांगना न पड़े-- यह मंगल कामना पूर्ण हो। श्राद्धकृत्य का मुख्य कर्म श्रद्धा माना गया है। श्रद्धा अर्थात्--पवित्र आस्था। जिसमें आस्था नहीं, वह श्राद्ध करने का अधिकारी नहीं होता है।

कौन सा श्राद्ध है मान्‍य

कात्यायन ऋषि के अनुसार शाक-सब्जी से भी किया गया श्राद्ध स्वीकार होता है। अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार श्राद्ध अच्छे से अच्छा करना चाहिए। पर अभाव की स्थिति में शाक-सब्जी से भी किया गया श्राद्ध स्वीकार होता है। इसके विपरीत यदि श्रद्धा नहीं है तो धन खर्च करने पर भी वह पूर्वजों को स्वीकार नहीं होता। वह निष्फल हो जाता है। श्रद्धा मन का पवित्र भाव होता है और भाव जगत के प्राणी (पितर) हमारे श्रद्धा-अश्रद्धा के भावों को तत्काल जान-समझ जाते हैं।

प्राचीन काल में श्राद्धों में पशुबलि दी जाती थी। इसका रहस्य क्या था?--पता नहीं। वह कालान्तर में लुप्त हो गई। उसकी जगह अब खड़ी उड़द की दाल और आटे की बनी पशु आकृति अर्पित की जाती है। माना जाता है कि पिता पुत्र का और बड़ा भाई छोटे भाई का श्राद्ध नहीं कर सकता। लेकिन यदि ज़रूरत पड़े तो यह श्राद्ध भी किया जा सकता है। किसी को भी किसी का भी स्नेहवश श्राद्ध करने की अनुमति है विशेषकर गया में। आपातकाल में उपनयनहीन पुत्र भी अंत्येष्टि से जुड़े मन्त्रों का उच्चारण ब्राह्मण के माध्यम से कर सकता है।

महालय श्राद्ध और दान

पंडित वैभव के अनुसार पितरों और मृतात्माओं को सुपात्र या ब्राह्मण के माध्यम से अन्न, जल, वस्त्रादि के द्वारा तृप्त और संतुष्ट करने का विधान हमारे शास्त्रों में आया है और इसी परम्परा का निर्वहन हज़ारों वर्षों से भारत के सनातन हिन्दू धर्म में होता चला आया है। चूंकि हर कार्य का कोई न कोई कारण होता है, इस श्राद्धकर्म के पीछे भी हमारे ऋषियों, मुनियों ने कोई ठोस और वैज्ञानिक कारण जाने और देखे थे जिस कारण यह विधान बनाया गया था। न सिर्फ विधान बनाया, वल्कि उसके व्यवहार पक्ष को भी सहस्राब्दियों से अपनाया था। परन्तु दुःख का विषय है कि आज भारत की बदलती तस्वीर के साथ-साथ लोगों की पुरानी अच्छी सोच इसलिए बदल रही है कि यह पुरानी हो चुकी है।

भाद्रपद का अन्तिम पखवाड़ा जब सूर्यराशि में होता है, 'महालय' या 'गजछाया' कहलाता है। सावन माह की पूर्णिमा के बाद जब भाद्रपद में कृष्णपक्ष हो और सूर्य कन्या राशि में हो तो आगामी 16 दिन श्राद्ध के लिए पवित्र और उपयुक्त माने जाते हैं। कन्याराशि के अन्तर्गत कृष्णपक्ष सम्भव न हो तो तुलाराशि के अंतर्गत सूर्य के वृश्चिक राशि में जाने से पूर्व किया जा सकता है। सूर्य वृश्चिक राशि में चला जाये, अगर श्राद्ध न हो तो पितरगण वंशजों को श्राप दे देते हैं। भाद्रपद आश्विन कृष्णपक्ष श्राद्ध के लिए उपयुक्त माना गया है। इस मास में पितरों का वास होता है। इसीलिए इसे महालय कहा जाता है। इस समय श्राद्ध किसी कारणवश न हो सके तो कार्तिक मास में कृष्णपक्ष की अमावस्या को भी किया जा सकता है। महालय श्राद्ध की तिथि श्राद्धकाल की पहली तिथि से लेकर अमावस्या तक कभी भी हो सकती है। महालय श्राद्ध सबसे फलित माना गया है। आवाहन, हवन, अर्घ्य व पिण्डदान आवश्यक है। एक या तीन सुपात्र या ब्राह्मण को खाना खिलाना अनिवार्य माना गया है। महालय श्राद्ध के विश्वेदेव हैं--धूरि तथा लोचन। यह श्राद्ध मातृकुल तथा पितृकुल के पितरों के आलावा अन्य सम्बन्धियों के लिए भी होता है। गुरु, शिष्य आदि के लिए भी इसे किया जा सकता है।

सन्यासियों का श्राद्ध महालय की 'द्वादशी' को ही होता है। क्योंकि विष्णु के लिए द्वादशी पावन है। हर श्राद्ध के बाद कर्ता के लिए सामर्थ्य अनुसार दान देने का निर्देश है। बिना दक्षिणा के श्राद्ध फलित नहीं होता हैं। धन, गाय, वस्त्र, शै्या आदि दान हैं लेकिन शैयादान का विशेष महत्व है। शैयादान का अर्थ है कि जैसे विष्णु की शैया सागरपुत्री लक्ष्मी से कभी ख़ाली नहीं होती, उसी प्रकार मेरी शैया भी जन्म-जन्मान्तर तक भरी-पूरी बनी रहे।

आभ्युदायिक श्राद्ध

पंडित वैभव के अनुसार पुरखों को हम श्राद्ध काल में ही नहीं, वरन अन्य अवसरों पर भी याद करते हैं। पुत्र-जन्म, मुण्डन, उपनयन, विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर अथवा कुंआ, बावड़ी, प्याऊ आदि बनवाने पर भी उनका स्मरण व श्राद्ध किया जाता है। श्राद्धों में जहां विषम संख्या अर्थात् 3, 11, 21 ब्राह्मण होते हैं, वहीँ आभ्युदय श्राद्ध में सम संख्या अर्थात् 2, 8,10 ब्राह्मण होते हैं। प्रदक्षिणा सहित सभी कृत्य बाएं से दांये की ओर किये जाते हैं। सामग्री में काले तिल के स्थान पर जौ का उपयोग होता है। आभ्युदय श्राद्ध में दक्षिण मुख की बजाय उत्तर की ओर मुख किया जाता है और कहा जाता है कि मैं नान्दीमुख पितरों का आवाहन करता हूंं--

मन्वादीनां मुनिन्द्राणाम्

सूर्यचंद्रमसोस्तथा।

तान् नमस्याभ्यहं सर्वान्

पितृनप्सूदधावपि।।

अर्थात्--जो मनु आदि राजर्षियों, मुनीश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी नमन करता हूंं। अभ्युदय पूजा में 'स्वधा' के बजाय 'स्वाहा' शब्द का प्रयोग होता है।

ब्राह्मण भोज के समय इन्द्र को सम्बोधित किया जाता है और शान्ति मन्त्रों का पाठ होता है, पितरों से सम्बन्धित मन्त्रों का नहीं। अन्त में कर्ता नान्दीमुख पितरों से आशीर्वाद मांगता है।

 

Posted By: Tanu Gupta

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