आगरा, तनु गुप्‍ता। कर्म का ज्ञान देने वाले कर्मयागी श्रीकृष्‍ण का अवतरण ि‍दिवस यूं तो पूरी दुनिया मनाने की तैयारी कर चुकी है। कितना हैरतभरा सत्‍य है ये कि जो अजन्‍मा है उसका जन्‍म। केवल कर्म की प्रधानता के बखान और असत्‍य पर सत्‍य की जीत के लिए। धर्म विज्ञान के शोध बताते हैं कि बिना कृष्‍ण तत्‍व को जाने और समझेे कृष्‍ण आराधना अधूरी है। मुनष्‍य ऊर्जा रहित है। कृष्‍ण तत्‍व के बारे में धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी महाभारत काल की एक गाथा की चर्चा की।

उन्‍होंने बताया कि श्रीकृष्ण की इच्छा थी कि उनके देह-विसर्जन के पश्चात द्वारकावासी अर्जुन की सुरक्षा में हस्तिनापुर चले जाएं। सो अर्जुन अन्त:पुर की स्त्रियों और प्रजा को लेकर जा रहे थे। रास्ते में डाकुओं ने लूटमार शुरू कर दी। अर्जुन ने तत्काल गाण्डीव के लिए हाथ बढ़ाया। पर गाण्डीव तो इतना भारी हो गया था कि प्रत्यंचा खींचना तो दूर, धनुष को उठाना ही संभव नहीं हो पा रहा था। महाभारत के विजेता, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी विवश होकर अपनी आंखों के सामने अपना काफिला लुटता देख रहे थे। विश्वास नहीं हो रहा था कि वह वही है, जिसने अजेय योद्धाओं को मार गिराया था। बिजली की कौंध से कृष्ण शब्द उनके मन में गूंज गए ‘तुम तो निमित्त मात्र हो पार्थ।’ पंडित वैभव कहते हैं कि ‘श्रीमद्भागवत’ का यह प्रसंग जितना मार्मिक है, उतना ही एक अखंड सत्य का उद्घोषक भी। जीवन में जब-जब कृष्ण तत्व अनुपस्थित होता है, तब-तब मनुष्य इसी तरह ऊर्जा रहित हो जाता है।

धर्म वैज्ञानिक वैभव जोशी 

कृष्‍ण के जीवन का अर्थ

कृष्ण के न रहने का मतलब है, जीवन में शाश्वत मूल्यों का ह्रास। उनका जीवन प्रतीक है अन्याय के प्रतिकार का, प्रेम के निर्वाह का, कर्म के उत्सव का, भावनाओं की उन्मुक्त अभिव्यक्ति का, शरणागत की रक्षा का। जड़-सिद्धांतों के या किन्हीं सम्प्रदायों के लिए हठ का उनके विचारों में कोई स्थान न था। वे प्रतिबद्ध थे- कर्म के प्रति। कहीं कोई निजी हित या प्रयोजन प्रेरित कर्म न था, इसलिए कर्मफल से लगाव भी नहीं था।

कृष्‍ण की लीलाओं का अर्थ

पंडित वैभव के अनुसार गोकुल में कान्‍हा लीलाएं अनाचारी व्यवस्था का विरोध थीं, ग्रामवासियों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करके, स्वावलम्बी बनाना ही उनका प्रयोजन था। मथुरा गमन के बाद का जीवन भी असत्य और निरंकुशता का दमन करते हुए निष्कलंक निकल आने का आदर्श प्रस्तुत करता है। जरासंध- शिशुपाल जैसी समाज विरोधी शक्तियों का विनाश किया, पर उससे पहले सुधार का भरपूर अवसर दिया। विनाशकारी महाभारत के युद्ध से पूर्व शांति दूत बन कर हर सम्भव प्रयास किया युद्ध टालने का। जरासंध ने अपने दामाद कंस के वध का प्रतिशोध लेने के लिए 17 बार मथुरा पर आक्रमण किया। 18वीं बार कृष्ण ने शत्रु के अधिक शक्तिशाली होने पर व्यर्थ का जनसंहार बचाने के लिए रणभूमि छोड़ कर चले आने में कोई भी संकोच नहीं किया और द्वारका में जा बसे।

अपने कर्मों का दायित्व लेना सीखना हो तो फिर इस जगद्गुरु कृष्ण की ही शरण में जाना होगा। गांधारी के शाप से सम्पूर्ण यदुकुल का नाश हुआ। प्रभास क्षेत्र में अश्वत्थ की छाया में विश्राम करते हुए ‘जरा’ नामक व्याध के वाण का शिकार बने। पांव से रक्तधारा बहती रही। व्याध को भी उपचार करने नहीं दिया। शाप फलीभूत होना तो था ही। निरंतर कर्म की प्रेरणा से युक्त रहना ही कृष्ण तत्व को साकार करना है। अच्छे-बुरे फल को कृष्णार्पित कर देना ही जीने का मूल है। कृष्ण स्पंज हैं, सब सोख लेंगे। बस कृष्ण तत्व को जीवन में बनाए रखना होगा।

जानें कृष्‍ण अवतरण का अर्थ

पंडित वैभव के अनुसार ग्वालों एवं बालाओं के साथ खेलने वाला सरल-सा कृष्ण इतना अगम्य है कि उसे जानने के लिए ज्ञानियों को कई जन्म लेने पड़ते हैं, तब भी उसे नहीं जान पाते। कृष्ण कई ग्रंथों के पात्र हैं। आज उन पर सैकड़ों ग्रंथ लिखे जा चुके हैं और तब भी लगता कि उन्हें तो किसी ने छुआ भी नहीं है। उन पर सैकड़ों वर्षों तक लिखने के बाद भी उनकी एक मुस्कान को ही परिभाषित नहीं किया जा सकता।

पौराणिक मान्यताओं के आधार पर विष्णु भगवान ने 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में 8वें अवतार के रूप में देवकी के गर्भ से भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र में रात के ठीक 12 बजे जन्म लिया। ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था। हिन्दू कालगणना के अनुसार 5126 वर्ष पूर्व कृष्ण का जन्म हुआ था।

आखिर कृष्‍ण हैं क्‍या

कृष्ण क्या हैं? मनुष्य हैं, देवता हैं, योगी हैं, संत हैं, योद्धा हैं, चिंतक हैं, संन्यासी हैं, लिप्त हैं, निर्लिप्त हैं? क्या कोई परिभाषित कर सकता है? इतना बहुआयामी व्यक्तित्व, जो जन्म से ही मृत्यु के साये में जीता है। इन प्रश्‍नों के बाबत पंडित वैभव जोशी कहते हैं कि कृष्ण का जन्म जेल में हुआ। घनघोर बारिश में नंदगांव पहुंचे व जन्म से ही जिसकी हत्या की बिसात बिछाई गई हो, जिसे जन्म से ही अपने माता-पिता से अलग कर दिया हो, जिसने अपना संपूर्ण जीवन तलवार की धार पर जिया हो, वो ही इतने विराट व्यक्तित्व का धनी हो सकता है। कृष्ण जीवनभर यताति रहे, भटकते रहे, लेकिन दूसरों का सहारा बने रहे। बाल लीलाएं करके गांव वालों को बहुत-सी व्याधियों से बचाया, दिखावे से दूर कर्मयोगी बनाया, बुरी परंपराओं से आजाद कराया।

कृष्ण चरित्र सबको लुभाता है। कृष्ण संपूर्ण जिंदगी के पर्याय हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि जो भी पाना है, संघर्ष से पाना है। कृष्ण आत्मतत्व के मूर्तिमान स्वरूप हैं। कृष्ण की लीलाएं बताती हैं कि व्यक्ति और समाज आसुरी शक्तियों का हनन तभी कर सकता है, जब कृष्णरूपी आत्म-तत्व चेतन में विराजमान हो। ज्ञान और भक्ति के अभाव में कर्म का परिणाम कर्तापन के अहंकार में संचय होने लगता है। सर्वात्म रूप कृष्णभाव का उदय इस अहंकार से हमारी रक्षा करता है।

कंस गोहत्या का प्रवर्तक था। उसके राज्य में नरबलि होती थी। जरासंध 100 राजाओं का सिर काटकर शिवजी पर बलि चढ़ाने वाला था। कृष्ण ने इन दोनों आसुरी शक्तियों का संहार किया। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों की जूठी पत्तल उठाने का कार्य अपने हाथ में लिया था।

राम और कृष्‍ण अवतार

कृष्ण का चरित्र व्यक्ति के सुखों एवं दुखों में आबद्ध है। राम का शैशव किसी को याद नहीं है, सिर्फ बालकांड तक सीमित है, लेकिन कृष्ण का बाल्यकाल हर घर की शोभा है। हर मां अपने बालक के बचपन की तुलना कृष्ण के बचपन से करती है। उनका घुटनों के बल चलना, पालने से नीचे गिरना, माखन के लिए जिद करना, माता को प्रति पल सताना हर घर का आदर्श है।

राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं लेकिन कृष्ण की कोई एक उपाधि नहीं है। कृष्ण कहीं योगी, कहीं प्रेमी, कहीं योद्धा, कहीं युद्धभूमि से भागे रणछोड़, कहीं कूटनीतिज्ञ, कहीं भोले-भाले ग्वाले।

मनुष्य जीवन के जितने रंग, जितने सद्गुण, जीवन जीने के जितने आदर्श और व्यावहारिक दृष्टिकोण हैं, वे सब कृष्ण में समाहित हैं। आसक्ति से अनासक्ति का भाव सिर्फ कृष्ण में है। आसक्ति और विरक्ति की पराकाष्ठा कृष्ण का जीवन है। मेघ की तरह बरसकर रीता हो चल दिया इसलिए कृष्ण भारतीय जनमानस के नायक हैं।

कृष्ण कहते हैं- 'मद्भक्त एतद विज्ञाय मद्भावयोप पद्यते।'

'यदि मुझे पाना है तो मेरे सदृश्य बनो। अपने-अपने कर्म करते हुए कर्मयोगी बनकर ईश्वर की स्वकर्मणा पूजन करो। ये जीवन शयन क्षेत्र नहीं, कर्मक्षेत्र है।'

जन्माष्टमी, जो कि कृष्ण का अवतरण दिवस है, को मोहरात्रि कहा जाता है। यह आसुरी वृत्तिरूपी बुराइयों से दूर रहने की रात है। आज हम इस जन्माष्टमी के पर्व पर संकल्पित होकर उनके चरित्र के कुछ अंशों व कुछ आदर्शों को अपने जीवन में निहित करें।

'वासुदेव सुतं देवम कंस चाणूर मर्दनं, देवकी परमानंदम कृष्ण वन्दे जगद गुरुम।' 

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