जागरण संवाददाता/अली अब्बास, आगरा: 'ढूंढ लेना अंधेरों में मंजिल अपनी, जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते।' एक कवि की यह पक्तियां डॉक्टर पंकज भाटिया और उनकी पत्नी अनुराधा भाटिया पर सही साबित होती हैं। उन्होंने अंधेरों में जुगनू बनकर पूर्वोत्तर के आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की रोशनी ले जाने का फैसला किया। शादी के दो माह बाद डॉक्टर व उनकी पत्नी आदिवासी इलाकों में रहने चले गए। वनवास में 16 साल तक रहने के बाद शहर लौटने के बाद भी दंपती का दूसरों की सेवा करने का यह जुनून कम नहीं हुआ। पूर्वोत्तर राज्यों की लड़कियों को सुशिक्षित करने के लिए पिछले साल ताजनगरी में हॉस्टल खोला। वर्तमान में इसमें 19 लड़कियां उच्च शिक्षा एवं व्यवसायिक कोर्स कर रही हैं। कमला नगर बी-ब्लॉक निवासी डॉ. पंकज भाटिया मेडिकल की पढ़ाई के दौरान वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े। वर्ष 1987 में अनुराधा से शादी होने के बाद दोनों ने आदिवासी क्षेत्रों में जाकर रहने का फैसला किया। इससे कि उनको इलाज के साथ ही शिक्षा के प्रति जागरुक किया जा सके। वह छत्तीसगढ़ और झारखंड में आदिवासियों के बीच रहे। इस दौरान दोनों ने पाया कि आदिवासी बच्चों को प्राथमिक स्कूल में पढ़ने के लिए सात किलोमीटर तक चलना पड़ता है। महाविद्यालय, तो इन इलाकों से 40 से 50 किलोमीटर दूर स्थित थे। अनुराधा वनवासी कल्याण आश्रम के सेवा प्रकल्प संस्थान से जुड़ चुकी थीं। जिसका काम आदिवासी इलाकों में रहने वालों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना था। 16 साल तक आदिवासी इलाकों में काम करने के बाद दोनों वर्ष 2004 में आगरा लौट आए। यहां आने के बाद भी अनुराधा सेवा प्रकल्प संस्थान से जुड़ी रहीं। पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने की उनकी कोशिशें जारी रहीं। वहां रहने वाले बच्चों को उच्च शिक्षित एवं व्यवसायिक कोर्स कराने का सपना पिछले साल सितंबर में पूरा हुआ। दंपती ने सुल्तानगंज पुलिया बाइपास पर लड़कियों के लिए छात्रावास शुरू किया। वर्तमान में छात्रावास में 19 लड़कियां हैं। जो कि पूर्वोत्तर राज्यों के अलावा बिहार एवं नेपाल से आकर उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं। इनमें पांच पैरामेडिकल कोर्स कर रही हैं। एक एमबीए और एक नर्सिग में एमएससी के साथ ही पार्ट टाइम जॉब कर रही हैं। उद्यमी की मदद से मिली जगह आदिवासी क्षेत्रों की लड़कियों की उच्च शिक्षा में पहला रोड़ा उनके रहने को छात्रावास की तलाश करना था। कमला नगर के एक उद्यमी नंद मंघरानी की मदद से यह रोड़ा दूर हो सका। उन्होंने सुल्तानगंज पुलिया स्थित चार मंजिला इमारत की दो मंजिल में लड़कियों के छात्रावास की व्यवस्था की। डॉक्टर और व्यवसाई उठाते हैं पढ़ाई का खर्च छात्राओं की पढ़ाई से लेकर उनके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था में सात से आठ लाख रुपये प्रतिवर्ष का बजट है। यह सारा खर्च शहर के कई डॉक्टर और व्यवसायी मिलकर उठाते हैं। इसलिए लड़कियों कर रहे सुशिक्षित कहावत है कि एक पुरुष को शिक्षित करन से सिर्फ एक व्यक्ति ही शिक्षित होता है। जबकि एक लड़की को शिक्षित करने से पूरा परिवार शिक्षित होता है। डॉक्टर पंकज भाटिया और अनुराधा कहते हैं कि लड़कियों को शिक्षित करने का यही उद्देश्य है कि वह अपने गांव लौटने के बाद पूरे समाज को शिक्षित करेंगी। पिता की मौत के बाद टूट गया था सपना नेपाल और मेघालय की दो युवतियों का सपना लगभग टूट चुका था। आर्थिक हालात से जूझते परिवारों के लिए दोनों को पढ़ाना आसान नहीं था। पिता की मौत के बाद उनको लगा कि स्कूल जाने का सपना अब कभी पूरा नहीं हो सकेगा। इस बीच वह प्रकल्प सेवा संस्थान के संपर्क में आई। उसने उनको पढ़ाने का जिम्मा लिया। दोनों ही अब पैरामेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। गांव में पहली बार फहराया तिरंगा नगालैंड के वाकचिंग गांव की हमसायबी ने उत्तर भारत में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद गांव लौटकर आदिवासी बच्चों में ¨हदी भाषा पढ़ा रही हैं। इस साल 26 जनवरी को हमसायबी ने पहली बार अपने गांव में तिरंगा फहराया। चीन की सीमा से कुछ दूर स्थित इस गांव में तिरंगा फहराने पर सीमा सुरक्षा बल के जवान भी पहुंचे। उन्होंने दो साल की तैनाती के दौरान पहली बार किसी गांव में तिरंगा गणतंत्र दिवस पर उन्होंने झंडारोहण होते देखा था।