जागरण संवाददाता, आगरा: गांवों की जगह बसते शहर और वनों के स्थान पर दिन पर दिन उगते कंक्रीट के जंगलों से पर्यावरण में बदलाव आ रहा है। प्रदूषण की मार से जल-थल और वायुवीय जैव विविधता की कडि़यां टूट रही हैं। पारिस्थितिकीय तंत्र में संतुलन बनाने वाले जीव-जंतु और पक्षियों का अस्तित्व संकट में है। औद्योगिक कचरे और नदियों एवं तालाबों में सीधे फेंकी जाने वाली गंदगी ने पानी के भौतिक और रासायनिक गुण बदल दिए हैं। जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण के बीच तालमेल की डोर संभालने वाले 'पानी के भगवान' कहे जाने वाले पादप प्लवक भी प्रदूषण की मार से नहीं बच सके। आगरा कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर द्वारा किए शोध में आगरा परिक्षेत्र की नदियों में प्रदूषण की चिंताजनक स्थिति का खुलासा हुआ है।

पारिस्थितिकीयय तंत्र में जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र (ईको सिस्टम) में पादप प्लवक (फाइटो प्लांक्टोन) को चमत्कारिक जीव कहा जाता है। वह जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र की 70 प्रतिशत कॉर्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित कर प्रकाश संश्लेषित करने के बाद भोजन का निर्माण करते हैं। साथ ही ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं। इनको खाद्य श्रृंखला की प्रथम कड़ी कहा जाता है, दूसरी कड़ी जंतु प्लवक होते हैं। यह पादप प्लवक को अपना भोजन बनाकर पानी की प्राकृतिक अवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी उठाते हैं। यही पादप प्लवक वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिग) को नियंत्रित करने के साथ ही ऊर्जा को एक खाद्य स्तर से दूसरे खाद्य स्तर में स्थानांतरित करते हैं।

जल वैज्ञानिक एवं आगरा कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर विश्वकांत गुप्ता ने आगरा और उसके आसपास के जिलों की नदियों एवं तालाब के नमूनों को लेकर शोध किया। उन्होंने पाया कि जलीय प्रदूषण के कारण पानी के भौतिक और रासायनिक गुण बदल गए हैं। उसमें कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा, उसकी क्षारीयता, फ्लोराइड, बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) एवंफॉस्फेट की मात्रा बढ़ गई है। जिससे पानी की पारदर्शिता, घुलनशीलता, ऑक्सीजन में कमी आई है।

जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र को नियंत्रित करने वाले जीवों की प्रजातियांक्रैब, जोंक, लिमनिया, ड्रेगन मक्खी, लुम्ब्रिकुलस, लिम्नोलाइड्रिल आदि संख्या में तेजी से कम हो रहे हैं। डॉ. गुप्ता कहते हैं नदियों में प्रदूषण को दूर करने वाले जलीय जीवों की कम होने की यही गति रही तो आने वाले समय में नदियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

जलीय प्रदूषण के संकेत

जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र प्रदूषण की मात्रा बढ़ी हुई केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) से मापी जाती है। इसके साथ ही उसमें पाए जाने वाले संकेतक जीव प्रोटोफोकस, कॉस्मेरियम, टेट्रा स्पोरा की बढ़ी संख्या भी पानी में प्रदूषण की संकेत होती है।

इन जलीय प्रजातियों पर है संकट पैरामीशियम, आरसेला, सेटेरियम, क्रस्टेशियम, ऑस्ट्राकोडा, नौपली, साइप्रिस आदि जलीय जीवों की संख्या में तेजी से कमी पाई जा रही है। इसके साथ ही मछली की कई प्रजातियों जैसे रोहू, कतला, मृगाल वैलेगो, सिस्टस, सिरोसा, रीता-रीता, गोरामी, क्लापिया आदि की संख्या में कमी आई है।

ये है शुद्धता का पैमाना

पानी की शुद्धता का पैमाना उसमें पाई जाने वाली ऑक्सीजन होती है। पानी में ऑक्सीजन की मात्रा तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होने पर वह किसी इस्तेमाल का नहीं होता।

जैव विविधता दशक

संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2011 से 2020 तक जैव विविधता का दशक घोषित कर रखा है। जैव विविधता की अंतिम दो वर्षीय बैठक 2020 में होनी है।

जैव विविधता में भारत की स्थिति भारत की गिनती दुनिया के 12 जैव विविधता वाले देशों में होती है। यहां 45 हजार वनस्पतियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। यह विश्व की वनस्पति का सात फीसद है। जबकि जंतुओं की प्रजातियों में यह 6.5 प्रतिशत है। देश में 500 से अधिक अभ्यारण्य, 120 राष्ट्रीय उद्यान, एवं 18 बायो रिजर्व हैं। भारत में 16 प्रकार के वन पाए जाते हैं। देश में 15 हजार फूलों की प्रजाति पाई जाती हैं। इसके साथ ही 2546 मछली की प्रजाति, 423 स्तनपायियों की प्रजाति हैं। जबकि 1331 किस्म के पक्षियों का घर भारत में है। 'जैव विविधता को बचाना है तो मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना होगा। अन्यथा आने वाले समय में जलीय विविधता खत्म हो जाएगी। इससे पारिस्थितिकीय तंत्र प्रभावित होगा। पिछले दिनों आया तबाही भरा तूफान भी ग्लोबल वार्मिग के चलते पर्यावरण में आए बदलाव का नतीजा था।'

विश्वकांत गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर एवं जलीयविद

Posted By: Jagran

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