अली अब्बास, आगरा। दुनिया जिसे कहते हैं मिट्टी का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है। जेल में जीवन के दो दशक बिताने के दौरान और भी क्या-क्या बीत जाता है, चहारदीवारी से बाहर आने के बाद ही पता चलता है। जिन दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने के लिए बेचैन रहे, पता चला कि उनके पास अब वक्त ही नहीं है। वह सभी परिवार और नौकरी के संतुलन की जद्दोजहद के बीच सूचीबद्ध जीवन जीने के रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहे हैं।

केंद्रीय कारागार में बिताए हैं दो दशक

केंद्रीय कारागार की चहारदीवारी में दशक बिताने के बाद बाहर आने वाले बंदी विष्णु कुमार तिवारी भी इसी दुविधा से दो-चार हो रहे हैं। उन्हें अंदर से ज्यादा बाहर की दुनिया में धोखा दिखाई दे रहा है। वह स्वजन के बीच वापस आ गए, लेकिन अपने पुनर्वास के लिए अभी भी प्रयासरत हैं। अधिकारियों के साथ ही उनके द्वारा किए वादे भी स्थानांतरित हो गए।

जिन रिश्तों को हरा-भरा छोड़ गए थे सूख चुकी हैं उनकी जड़ें

विष्णु तिवारी कहते हैं जिन रिश्तों को हरा भरा छोड़ गए थे। लौटे तो पाया उसकी जड़ें सूख चुकी हैं। एससी/एसटी एवं दुष्कर्म के मामले में जेल में 20 वर्ष निर्दोष सजा काटने के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानते हुए रिहा करने के आदेश किए। मार्च 2021 में वह रिहा होने के बाद अपने गांव सिलावन थाना महारौली जिला ललितपुर पहुंचे।

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पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों से लेकर राजनीतिक दलों के नेता उनके पास आए। पुनर्वास का आश्वासन दिया था। उन्हें पुनर्वास के लिए जमीन का पट्टा देने, चारपाई, आवास और गाय दिलाने का आश्वासन दिया। मगर, 18 महीने बीतने के बाद भी उन्हें न ताे चारपाई मिली, ना ही घर। अधिकारियों के स्थानांतरण के साथ ही अाश्वासन भी उनके साथ चले गए। वह मां द्वारा छोडी गई दीवारों पर पड़े तिरपाल और टूटी हुई झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। पुनर्वास का जो सपना देखा था, वह अब टूटता और बिखरता दिखाई दे रहा है।

ये था मामला

वर्ष 2000 में महारौली थाने में विष्णु तिवारी के विरुद्ध एक महिला ने दुष्कर्म एवं एससीएसटी एक्ट का अभियोग दर्ज कराया था। पुलिस ने उनके विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया। जिसके आधार पर उसे सजा सुनाई गई थी।विष्णु कहते हैं कि पुलिस ने उनके मामले में निष्पक्ष जांच नहीं की।

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पैरवी में बिक गया खेत

विष्णु तिवारी ने बताया कि उनके परिवार के पास थोड़ा सा खेत था। उनके अभियोग की पैरवी में परिवार के लोगों को खेत का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा। कुछ हिस्सा बचा था, उस पर भी दूसरा पक्ष अपना दावा करता है।

दो दशक में बिछड़ गए कई स्वजन

विष्णु तिवारी के अनुसार, जेल में सजा बिताने के दौरान उनके कई अपने हमेशा के लिए उनसे बिछड़ गए। उनको सजा होने के गम में पिता की मृत्यु हो गई। इसके बाद मां और दो भाई भी उनका साथ छोड़ गए। जेल में हाेने के कारण वह अपने किसी भी स्वजन के अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हो सके। 

Edited By: Abhishek Saxena

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