आगरा [यशपाल चौहान]: यह कहानी कुछ फिल्मी जरूर है लेकिन है रीयल लाइफ के हीरो की। तन पर खाकी और मन में एक कलमकार। जबसे वर्दी पहनी तब से एक ही कसक दिल में कि कैसे पुलिस की छवि समाज में सुधरे।

जी हां, यह एक रीयल लाइफ के आइपीएस अधिकारी की कहानी है। एक फिल्म निर्देशक से मुलाकात और फिर उनसे फिल्म में पुलिस की छवि को लेकर बहस। इसी के साथ शुरू हुआ दिल की कसक को रूपहले पर्दे पर उतारने का सफर। वर्दी से लेकर पुलिसकर्मी के रहन सहन और क्राइम सीक्वेंस जैसी लंबी बहस के बाद कई फिल्मों में बदलाव हुए। कहानी बस इतने पर ही नहीं थमी। कुछ फिल्मों में डायलॉग भी दिए। ये खाकीधारी एक हीरो के मानिंद रीयल लाइफ में भी खाकी की छवि उजली करने को प्रयोग कर रहे हैं, फिल्मों की तरह ही उनके प्रयोग वास्तविकता में भी सफल हो रहे हैं।

बात हो रही है वर्ष 2007 बैच के आइपीएस अधिकारी एसएसपी अमित पाठक की, जिन्हें लेखन का शौक था। आइपीएस बनने के बाद उन्होंने अपने काम से पुलिस की छवि सुधारने के साथ ही कलम से भी प्रयास किए। सामाजिक मुद्दों पर जनता और सिस्टम के बीच के गैप को खत्म करने के लिए उन्होंने लेखन शुरू किया। 10 से अधिक नाटक लिखे और मंचन भी किया। हास्य व्यंग्य पर आधारित इन नाटकों के लेखन और मंचन में उनकी पत्नी आइआरएस अधिकारी नीलम अग्रवाल की भी अहम भूमिका थी। रोजमर्रा की पुलिसिंग में सामने आने वाली समस्याओं और घटनाओं को रोचक व व्यंगात्मक शैली में लिखने की कला उनकी नायाब है। इनके माध्यम से ऐसी बातें सामने लाने का प्रयास किया, जो आमतौर पर लोगों को पता नहीं होतीं। वर्ष 2011 में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप वाराणसी में गैंग्स ऑफ वासेपुर की शूटिंग करने पहुंचे थे। तभी उनसे आइपीएस अमित पाठक की मुलाकात हुई। उनकी फिल्म की स्क्रिप्ट पर चर्चा हुई। इसके बाद कई निर्देशकों ने उनके ऑफिस आकर मुलाक़ात की और पुलिसिंग को लेकर अपने संशय दूर किए। इसी तरह उनका दायरा बढ़ता गया। फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप की अगली फिल्म में उनके कुछ डायलॉग लिए गए। इसलिए फिल्म निर्माता निर्देशक ने उन्हें श्रेय भी दिया। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश झा भी उनके संपर्क में आने के बाद पुलिसिंग की बारीकियों पर उनसे चर्चा करने लगे। कई फिल्मों के डायलॉग पर एसएसपी से डिस्कशन हुआ। प्रकाश झा उत्तर प्रदेश पुलिस पर बनने वाली आगामी फिल्म धर्मक्षेत्र की स्क्रिप्ट पर चर्चा के लिए कुछ माह पहले आगरा आए थे। सत्य घटना पर आधारित उप्र पुलिस के कांस्टेबल की भूमिका पर बनाई जा रही इस फिल्म के लिए प्रकाश झा ने एसएसपी अमित पाठक से मुलाकात कर लंबा विचार विमर्श कर चुके हैं।

छोटी से लेकर बड़ी बातों पर विचार- विमर्श

एसएसपी अमित पाठक का कहना है कि फिल्म निर्माता और निर्देशकों से छोटी से लेकर बड़ी बातों पर डिस्कशन होता है। कई बार फिल्मों में पुलिस की वर्दी, पुलिसकर्मियों के रहन-सहन, चाल-ढाल और उनके सैल्यूट करने के तरीके को ठीक नहीं रहते। उनकी सलाह के बाद निर्देशकों के मन में पुलिस की छवि में बदलाव आया है। एसएसपी का कहना है कि सरकारी विभागों में पुलिस बॉलीवुड की सर्वाधिक रुचि का विषय है। आम जनता भी पुलिस में ही अपना नायक ढूंढ़ती है तभी इतनी फिल्में पुलिस पर बनती हैं । तो क्यों न इस नायक के सही दर्शन कराए जाएं। इसी उद्देश्य के साथ व्यस्तता के बीच से समय निकालकर इसके लिए काम करते हैं।

रीयल लाइफ के कार्य

- एसटीएफ में तैनाती के दौरान उन्होंने 3700 करोड़ रुपये का ऑनलाइन घोटाले का पर्दाफाश कर 650 करोड़ रुपये की बरामदगी की थी। यह पुलिस के इतिहास की सबसे बड़ी बरामदगी थी।

- पेट्रोल पंपों की घटतौली का पर्दाफाश करने के बाद पहले पूरे प्रदेश व बाद में कई अन्य प्रदेशो भी में छापेमारी करा पम्पो को सीज किया गया।

- आगरा में तैनाती के दौरान भ्रष्टाचार की शिकायत पर सौ से अधिक पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई।

- कभी बुलेट तो कभी साइकिल पर शहर में निकलकर हकीकत देखते हैं। इसके बाद मौके पर अधिकारियों को बुलाकर कमियां दूर कराते हैं। 

Posted By: Prateek Gupta

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