आगरा: मैं रामबाग हूं। वह रामबाग जिसके जर्रे-जर्रे में इतिहास दफन है। वह रामबाग जिसके आंचल में बैठकर सुकून मिलता है। जिसके चर्चे परदेसियों की जुबां पर भी हैं। मैं वही रामबाग हूं, जो पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। लेकिन जरा सोचो, आज मेरा हाल मेरे अपनों ने क्या कर दिया। जब कोई विदेशी पर्यटक आता है, तो मेरे आंचल में पसरे कचरे के ढेर को देख मेरे बारे में क्या सोचता होगा।

मेरी अपनी ताजनगरी के लोगों को शायद ये बताने की जरूरत नहीं कि मैं शहर का सबसे पुराना मुगलकालीन गार्डन हूं। आपको याद न हो तो मैं खुद ही बता दूं। मुगल शासक बाबर ने 1528 में यमुना नदी के किनारे मेरा निर्माण कराया। हरे-भरे पेड़ पौधों के बीच नदिया के तट पर जो लोग सुकून पाने आते हैं, उन्हें काफी ठंडक मिलती है। बाबर ने भी इसी सुकून के लिए मेरा निर्माण कराया था। तब इसे आरामबाग कहते थे। दूर-दूर से लोग मेरे पास सुकून पाने आते हैं। लेकिन आज अपना हाल देख दुख होता है। मेरे मुख्य द्वार पर देखिए, कूड़े के ढेर के बीच जब विदेशी मेहमानों का इस्तकबाल होता है, तो मुझे भी गहरा दुख होता है। मेरे आंचल में आने वाला हर देसी-विदेशी पर्यटक दुर्गध से बचने को मुंह पर कपड़ा रख लेता है। जाहिर है पर्यटक को तो पीड़ा होती ही है, मेरी पीड़ा भी अंतहीन है। केवल कूड़ा ही नहीं, मुख्य द्वार पर सीवेज का खुला मेनहोल भी हादसे को दावत दे रहा है। कभी कोई पर्यटक इसमें गिरा तो उसके मन मस्तिष्क में मेरी छवि क्या बनेगी। शहर के जिम्मेदारों को चाहिए कि जिस तरह ताज के हुस्न को संवारने के लिए संजीदा हैं, वैसी फिक्र मेरी भी करें। मेरे पास आने वाला मेहमान टिकट का पैसा भी सरकारी खजाने को देता है, फिर जिम्मेदार मुझसे क्यों रूठें। मेरा हाल बेहतर करने को जरा सुधि लीजिए।

Posted By: Jagran