अच्छी बारिश से 22 वर्षों बाद पक्षी विहार में प्रचुर मात्रा में पानी, दूर तक बिखरी हरियाली

 अक्टूबर से विदेशी सैलानी जमाने लगेंगे डेरा, पक्षियों की हर गतिविधि पर रहेगी नज

आगरा [प्रकाश मोहन गुप्‍ता]: देशी-विदेशी पक्षियों का आरामगाह भरतपुर का घना पक्षी विहार अब चहक उठा है। मानसून के दौरान अच्छी बारिश और विदाई के बाद भी पड़ती फुहारों ने हरियाली दूर-दूर तक बिखेर दी है। विदेशी पक्षियों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया है। वहीं उनकी हर गतिविधि को कैमरे में कैद करने के लिए सैलानियों ने भी बुकिंग कराना शुरू कर दिया है।

भरतपुर का केवलादेव नेशनल पार्क (घना) विश्वविख्यात है। करीब 29 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले एशिया के सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यान में इस समय प्रचुर मात्रा में पानी है। गोवर्धन कैनाल, पांचना बांध तथा अजान बांध से भरपूर पानी उद्यान को मिल रहा है। घना प्रशासन को आशा है कि इस वर्ष सर्दी में बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी पक्षियों की अठखेलियों का दीदार करने आएंगे। उम्मीद यह भी है कि अक्टूबर से यहां नौका विहार भी शुरू करा दिया जाए।

आइविस समेत तमाम विदेशी प्रजातियों ने डाला डेरा:

घना में पक्षियों के लिए दो मौसम मुफीद हैं। पहला वर्षा ऋतु, जो इन दिनों है। इस समय व्हाइट आइविस, कारमोरैंट, हैरान, पेंटेड स्टार्क, फीजेन्ट, देसी सारस, ओपिन बिल स्टार्क, इंडियन सैग, स्नेक बर्ड, स्पूनबिल आदि पक्षी बड़ी संख्या में आए हैं तथा घोंसलों के निर्माण में लगे हैं। यह मौसम इनके प्रजनन काल का भी है। इनकी नोंकझोंक, मेल-मिलाप एवं प्रेयसी के साथ जोड़े बनाने के लिए अपनाए जा रहे तरीके देखने योग्य हैं। प्रजनन काल में जब अण्डों से बच्चे निकल आते हैं तो बच्चों की चहचहाट से पूरा पक्षी विहार गुंजायमान हो उठता है। इस वर्ष पेंटेड स्टार्क प्रजाति के पक्षियों ने प्रचुर मात्रा में घोंसले बनाकर संतति की प्रक्रिया शुरू की है। यहां पहले पहुंचे ओपन बिल स्टार्क, कारमोरैंट आदि पक्षियों के बच्चे निकलना भी शुरू हो गया है।

साइबेरियन क्रेन आएंगे अक्टूबर में

अक्टूबर के अंतिम सप्ताह अथवा नवम्बर के प्रथम सप्ताह में हजारों किमी की यात्रा कर साइबेरियन क्रेन पहुंचेंगे। पश्चिमी देशों में जमा देने वाली सर्दी के मौसम में ये पक्षी प्रवास के लिए घना पहुंचते हैं। साइबेरिया, पूर्वी यूरोप, अफगानिस्तान, मध्य एशिया, मंगोलिया व श्रीलंका से लगभग 100 से अधिक प्रजातियों के मेहमान पक्षी यहां पहुंचते हैं। इनमें गे्रलेक गीज, वारहैड गीज, व्हाइट स्टार्क, पिनटेल्स, विजंस, मेलार्ड, गेडबेल, शावलर्स, डील्स, पीपिटस, लैपबिग आदि शामिल हैं।

यूनेस्को की चेतावनी पर चेती सरकार

पानी के लिए पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर पक्षी विहार को पिछले 22 वर्षों के दौरान कभी भी आवश्यकतानुसार पूरा पानी नहीं मिला। घना को लगभग 650-700 मिलियन क्यूबिक फीट पानी की आवश्यकता होती है। वर्ष 2008-09 में घना की स्थिति काफी खराब रही। यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा वापस लेने की चेतावनी भी दे दी। तब राज्य सरकार ने वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में गोवर्धन डे्रन से घना तक पाइप लाइन डलवाई, जिससे इस डे्रन से यमुना में जा रहे पानी को डायवर्ट कर घना तक लाया गया। इसके साथ ही चम्बल का पानी भी उपलब्ध कराया गया।

बिना भूले राह थामे रखना है विस्‍मयकारी

अंतर्राष्ट्रीय पक्षी विज्ञानी डाॅॅ. सलीम के अनुसार दूर देशों से बिना भूले अपने रास्ते पक्षियों का आना और फिर वापस जाना विस्मयकारी है। हजारों फीट ऊंची बर्फीली चोटियों, तूफानों व रेगिस्तानी रास्तों को पार करते हुए इन पक्षियों का आना-जाना अवश्य ही वैज्ञानिक युग में रडार से लैस विमानों के अपने लक्ष्य से भटकने जैसी बातों को चुनौती है।

 

Posted By: Prateek Kumar

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