केस वन - बीटेक छात्र को उल्टी की समस्या थी, डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड के बाद इम्युनोहिस्टो केमिस्ट्री कराई, इसमें पेनक्रियाज के पास ट्यूमर था। डॉक्टर ने न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर डायग्नोज करते हुए 2017 में ऑपरेशन किए। अब वे ठीक हैं।

केस टू - 72 साल के बुजुर्ग मरीज को पेट में दर्द और डायरिया की शिकायत थी। उनकी जांच कराई गई तो पेट में न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर डायग्नोज हुआ। इनका दो साल पहले ऑपरेशन किया गया, अब ये ठीक हैं।

केस तीन - न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर ऑफ सर्विक्स अति दुर्लभ होता है। इस तरह का केस 22 जुलाई 2005 में एसएन में 30 वर्षीय महिला में डायग्नोज हुआ था। उन्हें डायरिया और उल्टी की शिकायत थी। केस स्टडी जर्नल ऑफ ऑब्स एंड गायनी ऑफ इंडिया में पब्लिश हुआ था। महिला की मौत हो गई थी।

अजय दुबे, आगरा: न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर का आकार और व्यवहार। वहीं, 'पान सिंह तोमर' का हौसला, दुर्लभ बीमारी को मात दे सकता है। आंत और पेट में यह ट्यूमर लो ग्रेड होता है लेकिन फेफड़े सहित अन्य अंगों में यह घातक हो सकता है। ताजनगरी में बीटेक छात्र से लेकर 72 साल तक के मरीज न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर के इलाज के बाद खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।

हार्मोन पैदा करने वाली एंड्रोक्राइन कोशिकाएं और नर्व कोशिकाएं की असमान वृद्धि से न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर होता है। अक्सर यह पेट और आंत में डायग्नोज किया जाता है, यहां यह लो ग्रेड होता है। इसका आकार भी छोटा होता है, डॉक्टर आम बोलचाल में इसे शरीफ ट्यूमर भी कह देते हैं। मगर, आंत से यह लिवर में फैल जाता है। इसके बाद भी सर्जरी के बिना मरीज 10 से 15 साल तक बेहतर जिंदगी जी सकते हैं। मगर, फेफड़े में यह हाई ग्रेड होता है। खून से शरीर के अन्य अंगों में फैलने पर घातक हो सकता है। यह सर्विक्स सहित अन्य अंगों में न्यूरो एंड्रोक्राइन कार्सिनॉइड ट्यूमर की तरह से व्यवहार करता है तो मरीज के लिए घातक हो सकता है।

इम्युनोहिस्टोलॉजी और हार्मोन की जांच से पहचान

इम्युनोहिस्टोलॉजी और हार्मोन की जांच से न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर डायग्नोज किया जाता है। ट्यूमर के टुकड़े के लिए स्पेसफिक स्टेन इस्तेमाल किए जाते हैं। इससे ग्रेड का पता चलता है।

सर्जरी से ही हो जाता है इलाज

आंत और पेट में ट्यूमर के होने पर सर्जरी से ही इलाज हो जाता है। इसके बाद दो से तीन साल तक फॉलोअप किया जाता है। मगर, शरीर के अन्य अंगों में फैलने पर सर्जरी के साथ बायोथैरेपी देने की जरूरत होती है।

ये होते हैं लक्षण

पेट, आंत, पेनक्रियाज में ट्यूमर होने पर - डायरिया, पेट में दर्द, उल्टी, पसीना आना।

फेफड़े में ट्यूमर - खांसी रहना, बुखार, ब्लड प्रेशर बढ़ना, घबराहट, बेचैनी।

एपेंडिक्स सहित कई अन्य अंगों में ट्यूमर होने पर कोई लक्षण नहीं होते हैं।

न्यूरो एंड्रोक्राइन कार्सिनॉइड ट्यूमर सही समय से डायग्नोज होने पर इलाज से प्रोग्नोसिस अच्छी होती है, एसएन में इस तरह के केस एडवांस स्टेज में आ रहे हैं। केस स्टडी भी पब्लिश की गई थी।

डॉ. सुरभि गुप्ता, कैंसर रोग विशेषज्ञ एसएन मेडिकल कॉलेज

अधिकांश केस में न्यूरो एंड्रोक्राइन ट्यूमर लो ग्रेड होता है, मरीज सही हो जाते हैं। आंत और पेट का यह ट्यूमर लिवर तक पहुंच जाता है। इसके बाद भी मरीज 10 से 15 साल तक बेहतर जिंदगी जी सकते हैं। फेफड़े का ट्यूमर घातक होता है।

डॉ. अतुल गुप्ता, पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष एसएन मेडिकल कॉलेज

यह ट्यूमर छोटी आंत, फेफड़े सहित अन्य अंग में हो सकता है। इसका आकार छोटा है और अन्य अंगों में नहीं फैला है तो मरीज ऑपरेशन के बाद सही हो जाते हैं।

डॉ. नरेंद्र देव, कैंसर सर्जन

21 साल के बीटेक छात्र का एंड्रो क्राइन ट्यूमर होने पर ऑपरेशन किया था। वह ठीक है। इसी तरह से एक महिला और 72 साल के मरीज का ऑपरेशन किया था, वे भी ठीक हैं।

डॉ. हिमांशु यादव, गेस्ट्रो सर्जन

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