आगरा, जागरण संवाददाता। लॉकडाउन में सब्जियों की बर्बादी और गेहूं, सरसों को बेहतर दाम नहीं मिलने से परेशान हो चुके किसानों के सामने नया संकट खड़ा हो गया है। बाजरा की फसल में फॉल आर्मी वर्म लग गया है, जो बालियों का रस चूस रहा है। साथ ही पत्तियों, तने को नुकसान पहुंचा रहा है। किसानों का दावा है कि 30 फीसद फसल बर्बाद हो गई है। कृषि विभाग की क्षेत्रीय टीम गांव-गांव किसानों को जागरुक कर दवा अंदेशा होते ही दवा का छिड़काव कर फसल के बचाव की बात कही है।

जिले में 1.31 लाख हेक्टेयर में बाजरा उत्पादन होता है। बुवाई 15 जुलाई से 15 अगस्त के मध्य हुई है। मानसून के देरी से आने के कारण अधिकतर किसानों को बुवाई में देरी ही हुई थी। बाजरा में बालियां आ गई हैं, जबकि कुछ खेतों में फूल एवं दाना बनने लगा है। बाजरा की बालियों को वर्म नष्ट कर रहा है। ये पत्तियों, तनों को भी नुकसान पहुंचाता है। बरारा के किसान हर्षबर्धन ने बताया के सात बीघा में बाजरा की फसल हो रही है। कुछ क्षेत्र में वर्म का प्रकोप दिखाई दे रहा है। वर्म हर वर्ष फसल को नुकसान पहुंचाता है, जिसकी रोकथाम के लिए दवा का छिड़काव करना पड़ता है। इस बार ज्यादा खेतों में इसकी समस्या है, जिसका कारण खेतों में कम नमी होना है। खंदौली के किसान सौरभ चौधरी ने बताया कि पांच बीघा में बाजरा उत्पादन हो रहा है, जिसमें कीट का प्रकाेप दिख रहा है। दवा का छिड़काव कराया जा रहा है। पड़ोस के खेतों में भी ये ही समस्या है। 30 फीसद तक नुकसान होने की आशंका है। जिला कृषि अधिकारी डॉ. रामप्रवेश ने बताया कि ये वर्म बाजरा के साथ ही धान, ज्वार, गेहूं को भी नुकसान पहुंचाता है। नियंत्रण के लिए एनपीवी 250 एलई प्रति हेक्टेयर या क्लोरेंट्रामिलीप्रोल 18.5 फीसद की 0.4 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव किया जाना चाहिए।

फसल है प्रभावित तो करें वॉट्सएप

जिला कृषि अधिकारी ने बताया कि किसी भी वर्म, रोग, खरपतवार की समस्या की पहचान, समाधान के लिए किसान प्रभावित पौध की फोटो वॉट्सएप कर सकते हैं। 9452247111, 9452257111 नंबर पर वॉट्सएप के 48 घंटे के अंदर रोग का उपचार बताया जाएगा।

इस समय बाजरा मिल्की स्टेट में है, जिस पर फाल आर्मी वर्म का प्रकोप देखा जा सकता है। कीटनाशी का छिड़काव अधिक प्रकोप होने पर ही किया जाए। अगर प्रारंभिक स्थिति है, तो नीम ऑयल का छिड़काव कर सकते हैं। नीम ऑयल का प्रयोग एक लीटर में एक मिली लीटर करना चाहिए।

डॉ. आरएस चौहान, वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र

 

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