केस स्टडी 1- शाहगंज निवासी राहुल के सोशल मीडिया पर तीन हजार से ज्यादा दोस्त हैं। लेकिन असली जिंदगी में उसके पास गिने-चुने दोस्त हैं। इसी वजह से वह खुद को अकेला महसूस करने लगा और डिप्रेशन का शिकार हो गया।

केस 2- नमिता हर समय सोशल मीडिया पर एक्टिव रहती है। सुबह से लेकर रात तक फोटो अपलोड करना, स्टेटस चैक करना, लाइक करना, पोक करना चलता है। दिन भर सोशल मीडिया में रहने वाली नमिता की स्थिति अब यह है कि वो मनोचिकित्सकों के पास इलाज करवा रही है क्योंकि उसे असली जिंदगी में दूसरों से पीछे छूटने का डर है।

आगरा, प्रभजोत कौर। यह दो केस उदाहरण मात्र हैं। इन दिनों शहर के युवाओं के बीच यह समस्या आम होती जा रही है। यह समस्या बीमारी का रूप ले चुकी है। मनोचिकित्सक इसे फोमो कहते हैं यानी फियर ऑफ मिसिंग। इस बीमारी से ग्रसित लोगों को लगता है कि वे बाकी दुनिया के मुकाबले पीछे छूट रहे हैं। वे अकेले हैं, उनका कोई दोस्त नहीं है। इस बीमारी से अंजान लोग डिप्रेशन की शिकायत के साथ मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं।

क्या है फोमो?

फोमो में इंसान की दूसरे लोगों की जिंदगी से हर समय जुड़े रहने की इच्छा होती है। खासतौर पर सोशल मीडिया के माध्यम से। ऐसे लोगों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम के द्वारा दूसरे लोगों की जिंदगी में अपनी अहमियत देखते रहना पसंद होता है और उनकी जिंदगी से जुड़े रहना अच्छा लगता है। फोमो के शिकार लोगों को अपने जीवन में आई छोटी-सी तकलीफ भी ऐसी लगती है कि जैसे कितना बड़ा हादसा हो गया है। उन्हें लगता है कि दुनिया में जितनी भी परेशानियां हैं वे सब सिर्फ उनकी जिंदगी में ही हैं। मुख्य रूप से फोमो वह मानसिक स्थिति है, जो लोगों के मन में दूसरे लोगों की जिंदगी से बाहर होने या उनकी जिंदगी में अपनी अहमियत खोने के डर से जुड़ी है। यह लोगों में पीछे छूटने का डर पैदा करती है।

यह हैं लक्षण

फोमो के शिकार लोग हर समय सोशल मीडिया पर यह चेक करते रहते हैं कि दूसरे लोगों की जिंदगी में क्या हो रहा है। वे सोशल मीडिया पर क्या पोस्ट कर रहे हैं। इस बीमारी से ग्रसित लोगों को यह भी चिंता रहती है कि उनकी फोटो या पोस्ट पर कितने लाइक या कमेंट आ रहे हैं।

क्‍या कहते हैं मनोचिकित्‍सक

सबसे पहले जरूरी है कि आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल कम करें। वर्चुअल दुनिया में नहीं वास्तविक दुनिया में अपना दायरा और लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ाएं।

- डा. केसी गुरनानी, मनोचिकित्सक

मेरे पास ऐसे कई युवा आते हैं जो सोशल मीडिया की जिंदगी में रहते हैं। असली जिंदगी में उनके दोस्त नहीं हैं क्योंकि वे अपना सारा समय सोशल मीडिया पर देते हैं। ऐसे में उनकी काउंसलिंग की जाती है और उन्हें रीयल लाइफ में दोस्त बनाने की सलाह दी जाती है।

- डा. दिनेश राठौर, मनोचिकित्सक, मानसिक आरोग्यशाला 

Posted By: Prateek Gupta

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