डायबिटीज और डायजेशन, दोनों में असरदार; चंबल के जंगल में पाए जाने वाला वन करेला
चंबल के बीहड़ों में पाया जाने वाला वन करेला, जो सामान्य करेले से छोटा और अधिक कड़वा होता है, ग्रामीणों ...और पढ़ें

करेला और ककोरा जैसा दिखने वाला वन करेला।
HighLights
चंबल के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है यह खास वन करेला।
डायबिटीज रोगियों में शुगर नियंत्रण और पाचन शक्ति में सहायक।
मुन्नालाल शर्मा, फतेहाबाद (आगरा)। चंबल के बीहड़ों की कंटीली झाड़ियों के बीच प्रकृति ने सेहत का ऐसा खजाना छिपा रखा है, जिसकी पहचान ग्रामीणों को कई पीढ़ियों से है। वन करेला चंबल, उटंगन और यमुना नदी के किनारे जंगलों में बारिश के मौसम में अपने आप उगता है। सामान्य करेले से छोटा और अधिक कड़वा माने जाने वाला वन करेला ग्रामीणों की पारंपरिक रसोई का हिस्सा है।
स्वाद में कड़वाहट के बावजूद इसके पोषण और पारंपरिक औषधीय महत्व ने इसे खास बना दिया है। वन करेले की बेल झाड़ियों और दूसरी वनस्पतियों के सहारे फैलती है। बारिश में जंगलों की हरियाली बढ़ने के साथ इसके छोटे फल दिखाई देने लगते हैं। स्थानीय ग्रामीण इसे पहचानकर जंगल से बीनते हैं और घर लाकर सब्जी के रूप में पकाते हैं।
मसालों के साथ तैयार होने वाली इसकी सब्जी कड़वी जरूर होती है, लेकिन ग्रामीण इसे पसंद से खाते हैं। दरअसल इसे डायबिटीज रोगियों में शुगर कंट्रोल करने के लिए भी माना जाता है। वहीं पाचन शक्ति को भी यह मजबूत करता है।
आयुर्वेद में ‘कारवेलक’ नाम से वर्णित
करेले का महत्व केवल ग्रामीण परंपरा तक सीमित नहीं है। आयुर्वेद में इसे ‘कारवेलक’ नाम से जाना जाता है। तिक्त यानी कड़वे रस वाली इस वनस्पति का पारंपरिक उपयोग पाचन, भूख, त्वचा संबंधी समस्याओं और रक्त शर्करा से जुड़ी स्थितियों में किया जाता रहा है।
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय बमरौली कटारा के चिकित्सक डा. योगेश कुमार ने बताया कि करेला तिक्त रस वाली सब्जी है। आयुर्वेद में इसे कारवेलक कहा गया है। यह पाचन को बेहतर रखने, भूख को संतुलित करने और कफ-पित्त से संबंधित असंतुलन में उपयोगी माना जाता है। रक्त शर्करा को नियंत्रित रखने में भी करेले के उपयोग का पारंपरिक उल्लेख है।
मधुमेह पर वैज्ञानिक शोध ने बढ़ाई रुचि
करेले में मौजूद कुछ जैव सक्रिय तत्वों के रक्त शर्करा पर संभावित प्रभाव को लेकर आधुनिक विज्ञान में भी शोध हुए हैं। कुछ अध्ययनों में रक्त शर्करा और दीर्घकालिक रक्त शर्करा के स्तर में कमी के संकेत मिले हैं। इसके अलावा रक्त में वसा और शरीर के चयापचय पर भी संभावित प्रभाव को लेकर अध्ययन किए गए हैं।
हालांकि सभी शोधों के परिणाम एक जैसे नहीं हैं। इसलिए करेला मधुमेह की दवा का विकल्प नहीं है। मधुमेह की दवा लेने वाले लोगों को चिकित्सक की सलाह के बिना करेले का अत्यधिक रस या सघन मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।
