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आगरा: धर्म और संस्कृति के सशक्त होने से शक्तिशाली होगा राष्ट्र, हिंदी के विद्वानों ने किया चिंतन

By Nirlosh Kumar Edited By: Prateek Gupta
Published: Sat, 19 Sep 2026 03:49 AM (IST)

आगरा में दैनिक जागरण द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी में 'धर्म और संस्कृति का राष्ट्र निर्माण में योगदान' विषय पर चर्चा ...और पढ़ें

आगरा दैनिक जागरण कार्यालय में पूर्व प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन की स्मृति में चर्चा करते विषय विशेषज्ञ।

आगरा दैनिक जागरण कार्यालय में पूर्व प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन की स्मृति में चर्चा करते विषय विशेषज्ञ।

जागरण संवाददाता, आगरा। दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक और राज्यसभा सदस्य नरेंद्र मोहन की स्मृति में शुक्रवार को 'धर्म और संस्कृति का राष्ट्र निर्माण में योगदान' विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ।

दैनिक जागरण कार्यालय में हुई गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि धर्म और संस्कृति के शक्तिशाली होने से ही शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण होगा। यह दोनों कमजोर हुए तो राष्ट्र भी सशक्त नहीं हो सकेगा। भारतीय संस्कृति की पूरे विश्व के कल्याण की कामना की भावना हमारे नैतिक मूल्यों की ही देन है

प्रो. उमापति दीक्षित ने पूर्व प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन काे श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए कहा कि राम मंदिर आंदोलन, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने और प्रिंट मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को दिशा देने का काम उन्होंने किया था। उन्होंने कहा कि हमारा शरीर ही राष्ट्र और सेवा ही परम धर्म है। आचरण ही धर्म है।

सांस लेने वाला हर जीव राष्ट्र का अभिन्न अंग है। भारतीय संस्कृति किसी को दु:ख देने वाली नहीं है। साहित्यकार डा. मधु भारद्वाज ने कहा कि धर्म व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण कर उसे सात्विक और आस्तिक बनाता है। संस्कृति समाज की पहचान कराती है। भारत का धर्म व्यक्ति के बजाय समाज को सर्वोपरि मानता है।

यहां व्यक्ति से अधिक राष्ट्र को महत्व दिया गया है। वायुसेना से सेवानिवृत्त हरीश कुमार सिंह भदौरिया ने कहा कि आदिकाल से अब तक जीने की शैली धर्म और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को कला, ज्ञान, विश्वास, रीति-रिवाज, नैतिक मूल्यों का हस्तांतरण संस्कृति है। धर्म और संस्कृति का राष्ट्र निर्माण में बहुत बड़ा योगदान है।

आकाशवाणी से सेवानिवृत्त दुर्गविजय सिंह दीप ने कहा कि भारतीय संस्कृति में पूजा-पद्धति या आचार-विचार को धर्म मान लेना उचित नहीं होगा, मानव कल्याण ही सच्चा धर्म है। धर्म और संस्कृति राष्ट्र निर्माण का मूल आधार हैं। आकाशवाणी से सेवानिवृत्त श्रीकिशन ने कहा कि दीपावली पर हम शुभ-लाभ लिखते हैं।

हमारी संस्कृति की यह विचारधारा है कि किसी का अशुभ नहीं हो। सभी सुखी होंगे तभी राष्ट्र समुन्नत हो सकेगा। प्रो. वेद त्रिपाठी ने कहा कि किसी भी धर्म और संस्कृति पुष्ट नहीं होंगे, तो समाज भी पुष्ट नहीं हाेगा, जिससे राष्ट्र भी मजबूत नहीं हो सकेगा।

Narendra Mohan Ji Seminar

डा. शशि गोयल ने कहा कि राष्ट्र को बनाए रखने के लिए धर्म और संस्कृति बहुत आवश्यक हैं। धर्म और संस्कृति इसलिए बनाए गए थे जिससे कि लोग नियमों का पालन करें और अराजकता नहीं फैले।

सुशील सरित ने काव्य पाठ करते हुए कहा, संस्कृति नींव है राष्ट्र की, धर्म सुदृढ़ आधार, दोनों से ही जुड़े हैं, राष्ट्र प्रगति के तार...। सेवानिवृत्त बैंकर चंद्रशेखर शर्मा ने कहा कि संस्कृति के निरंतर समृद्ध होने से राष्ट्र का निर्माण होता है। पूर्व में धर्म ही कानून होता था। राष्ट्र निर्माण को धर्म और संस्कृति दोनों की महती आवश्यकता है

यशोधरा यादव ने कहा कि सुखी और समृद्ध जीवन के लिए आवश्यक है। संस्कृति हमें जीवन मूल्य सिखाती है। राष्ट्र निर्माण के लिए धर्म और संस्कृति दोनों आवश्यक हैं। वित्तीय सलाहकार राकेश निर्मल ने कहा कि धर्म का अर्थ मजहब या कर्मकांड नहीं है। धर्म वह है, जिसका पालन बिना डरे किया जाए। हमें अध्यात्म ही नहीं, हर क्षेत्र में समृद्ध होना होगा।

डा. नेहा विश्वकर्मा ने कहा कि धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान होता है। धर्म और संस्कृति से ही राष्ट्र उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता है। डा. अंकिता तिवारी ने कहा कि धर्म सही दिशा दिखाता है। हम जैसा व्यवहार करें वह हमारे आचरण में परिलक्षित होना चाहिए।

डा. केशव शर्मा ने कहा कि हमें अपने धर्म और संस्कृति को मजबूत करना होगा। यदि यह कमजोर हुए तो राष्ट्र कमजोर होगा। नैतिक मूल्य उच्च स्तर के होने से हमारा राष्ट्र भी तरक्की करेगा। विचार गोष्ठी में माडरेटर की भूमिका दैनिक जागरण के आगरा-अलीगढ़ यूनिट के संपादकीय प्रभारी अवधेश माहेश्वरी ने निभाते हुए विषय प्रवर्तन किया।

अक्षरश: पढ़ते थे पूर्व प्रधान संपादक के लेख

प्रो. वेद त्रिपाठी ने कहा कि दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन के संपादकीय और विशिष्ट लेख वह अक्षरश: पढ़ते थे। उनमें राष्ट्र के प्रति समर्पण, राष्ट्र निर्माण को आह्वान और निर्माण के विशिष्ट सुझाव होते थे।

दैनिक जागरण का धर्म, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण में योगदान अनूठा है। जनमानस को राष्ट्र निर्माण को तैयार, सजग करने में भूमिका अभूतपूर्व है। देश में आज जो राष्ट्रवाद की भावना नजर आती है, उसमें जागरण का योगदान है।