आगरा, मृत्युंजय शुक्ला। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरी झंडी देने के बाद लोगों की ओर से तमाम टिप्पणियां हो रही हैं। दिक्कत ये है कि हम जल्दी निष्कर्ष पर चले जाते हैं और कोर्ट के फैसलों पर भी टिप्पणी करने लग जाते हैं, लेकिन हमे ये मानकर चलना होगा कि कोर्ट का जो भी आदेश है वह सही है और हमे मानना चाहिए। सामान्य लोगों को अधिकार नहीं है कि वह कोर्ट के आदेश पर टिप्पणी करें। हां, धार्मिक मामलों में कोर्ट को भी हस्तक्षेप से बचना चाहिए। ऐसे मामलों में बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जानी चाहिए, ताकि सामाजिक व्यवस्था और कानून व्यवस्था बनी रहे।

सोमवार को जागरण विमर्श कार्यक्रम में 'सबरीमाला प्रकरण में क्या सुप्रीम कोर्ट को अपना फैसला बदलना चाहिए विषय पर वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अरविंद मिश्रा ने अपनी राय रखी। उन्होंने बताया कि सबरीमाला मंदिर पर फैसला पांच न्यायाधीशों की बेंच ने दिया। इनमें से चार न्यायाधीशों के निर्णय के निष्कर्ष समान हैं, जबकि पांचवें न्यायाधीश का निष्कर्ष अलग है। चार जजों के बहुमत के बाद ये फैसला लिया गया कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिए। दरअसल, अनुच्छेद 14, 15, 17 और 25 से ये निर्णय संबंधित है। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग आदि के भेदभाव पर रोक लगाता है और अनुच्छेद 17 छूआछूत के खिलाफ है। वहीं अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इनके आधार पर चार न्यायाधीशों ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का अधिकार दिया। जबकि, पांचवीं न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने अनुच्छेद 25 के आधार पर तर्क दिया कि आस्था के मामले में कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। चार जजों के निर्णय के निष्कर्ष समान होने के कारण बहुमत के आधार पर सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश का अधिकार दिया गया है। ऐसे में फैसले को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायालय को धार्मिक मामलों से बचना चाहिए

डॉ. अरविंद मिश्रा ने कहा कि न्यायालयों को धार्मिक मामलों से बचना चाहिए। कहा कि इसके लिए कोर्ट को बीच का रास्ता निकालना चाहिए। उन्होंने हाल ही में सीबीआइ और बंगाल सरकार के टकराव के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में बीच का रास्ता निकालकर सामाजिक और कानून व्यवस्था कायम रखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि कोर्ट को ऐसे निर्णय से बचना चाहिए, जिसके कारण कानून और सामाजिक व्यवस्था बिगड़े। 

Posted By: Prateek Gupta

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