आगरा, किशन चौहान। फागुनी बयार और उस टेसू के फूलों के रंग की धार। हर तरफ उड़ता अबीर और गुलाल। बारी थी नंदगांव की बरसाना से हिसाब चुकाने की। लठ यहां भी तैयार थे। सोलह श्रृंगार से सजीं नंदगांव की हुरियारिनों ने बरसाना से आए हुरियारों पर तड़ातड़ लाठियों का प्रहार किया। लाठियों के वार जितने तेज हो रहे थे, नंदगांव और बरसाना के संबंध में उतनी ही प्रगाढ़ता बढ़ रही थी। वैश्विक मंच पर दोनों गांवों की लठामार होली की साझा संस्कृति के हजारों लोग गवाह बने। 

नंदगांव के हुरियारों ने शुक्रवार को बरसाना में मिली हार का बदला लेने के लिए अपनी हुरियारिनों को आगे कर दिया। शनिवार को नंदगांव में घर-घर रंग भिगोए गए। दोपहर करीब 2.30 बरसाना के हुरियारे राधारानी स्वरूप पताका के साथ पैदल और कुछ वाहनों से यशोदा कुंड पहुंचे। पहले तो यहां हुरियारों ने चक भांग ठंडाई छानी। इसके बाद हुरियारिनों के प्रहारों से बचने के लिए प्राथमिक कवच बतौर सिर पर पगड़ी बांध ली। इसके बाद हुरियारे भूरे का थोक होते हुए नंदबाबा के पहाड़ी स्थित भवन (नंदभवन) पर झुंडों में हंसी ठिठोली करते पहुंचे। नंदगांव के गोप ग्वाले यहां पहुंचने वाले हुरियारों का टेसू के फूलों के रंग से सराबोर कर स्वागत कर रहे थे। नंदभवन में होली के पदों के साथ अबीर गुलाल हवाओं में तैरने लगा। सभी समाजियों के एकत्रित होने के बाद पारंपरिक वेशभूषा से सुसज्जित नंदगांव, बरसाना के ग्वालबालों के मध्य अष्टछाप के कवियों के पदों का संयुक्त समाज गायन किया जा रहा था। समाज गायन में ठाकुरजी को अनुराग युक्त गालियां सुनाई जा रही थीं। आवौ री सखी आवौ, बृजराज कूॅ गारी सुनावौ।
नंदभवन में लगभग एक घंटे तक रंगों से सराबोर होने के बाद बरसाने के हुरियारे नंदगांव की गोपियों से हंसी मजाक करते हुए रंगीली गली से निकले। गोपियों के साथ होली के रसियों का गायन कर नृत्य किया।
गोपियों को उकसाने के लिए हुरियारे उनको भी प्रेम पगी गालियां सुनाते हुए होली चौक पर एकत्र होने लगे। समाज का इशारा मिलते ही हुरियारिनों ने जमकर लाठियां बरसाईं और प्रेम में मगन हुरियारे उनको फूलों की टहनियां मान, मार खा-खाकर निहाल हो रहे थे। समाज का आदेश हुआ कि सूर्यदेव छिप गए हैं, लठामार बंद की जाए। बरसाना के हुरियारे गोपियों के चरण स्पर्श कर बरसाना कूच कर गए।

ये है मान्यता

लठामार होली खेलने की शुरुआत भगवान कृष्ण और राधा के समय से हुई थी। मान्यता है कि भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाने होली खेलने पहुंच जाया करते थे। कृष्ण और उनके सखा यहां राधा और उनकी सखियों के साथ ठिठोली किया करते थे, जिस बात से नाराज होकर राधा और उनकी सभी सखियां ग्वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। लाठियों के इस वार से बचने के लिए कृष्ण और उनके दोस्त ढालों और लाठी का प्रयोग करते थे। प्रेम के साथ होली खेलने का ये तरीका धीरे-धीरे परंपरा बन गया।वहीं ब्रज में एक अन्य मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान कृष्ण फाल्गुन मास की नवमी को होली खेलने बरसाना गए और बिना फगुवा (नेग) दिए ही वापस लौट आए। राधाजी ने बरसाना की सभी सखियों को एकत्रित किया और बताया कि कन्हैया बिना फगुवा दिए ही लौट गए हैं। हमें नंदगांव चलकर उनसे फगुवा लेना है। अगले दिन ही (दशमी) को बरसाना की ब्रजगोपियां होली का फगुवा लेने नंदगांव आती हैं। कन्हैया की इसी लीला को जीवंत रखने के लिए यहां भी लठामार होली का आयोजन किया जाता है।

उड़ता है परंपराओं का गुलाल

यदि प्रेम के अनूठे रंग देखने हैं तो बरसाना और नंदगांव की होली को देखिए। यहां की होली के रंगों में प्रेम बरसता है। परंपराओं का गुलाल उड़ता है। अगर संबंधों को निभाना सीखना है तो ब्रज वालों से सीखिए। नंदगांव के लोगों में सखा भाव और बरसाने में सखी भाव की मिठास आज भी जीवंत है।

जन्मभूमि में रंगभरनी एकादशी पर होगा लठ्ठों का प्रहार

मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि पर रंगभरनी एकादशी पर सांस्कृतिक कलाकारों द्वारा लठामार होली का मंचन होगा। इसे देखने के लिए हजारों भक्त सुबह से ही जन्मभूमि प्रांगण में एकत्र हो जाएंगे।

नगाड़े की तान पर नृत्य करेंगी हुरियारिनें

रंगभरनी एकादशी पर रविवार को नौहझील के गांव मरहला मुक्खा में होली महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। परंपरा के अनुरूप पहले मरहला मुक्खा, बरौठ, पालखेड़ा, बाघर्रा, नौशेरपुर, पारसौली, बाजना, मानागढ़ी, जरैलिया, तिलकागढ़ी, रायपुर, मुसमुना, भैरई, दौलतपुर, छिनपारई, देदना आदि गांवों के लोग सुबह तड़के यमुना महारानी का पूजन करेंगे। इसके बाद गांव मरहला मुक्खा पहुंचकर एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देंगे। दिन की धूप चढ़ते-चढ़ते तमाम रंग-बिरंगे हुरियारे गांव में जगह-जगह होली के गीतों पर झूमते नजर आएंगे। जहां नगाड़ों की तान पर हुरियारिनें हुरियारों संग जमकर नृत्य करेंगी। हुरियारिनें हुरियारों पर प्रेम पगी लाठियां बरसाएंगी। रात्रि में जिकड़ी भजनों का मुकाबला होगा।  

Posted By: Prateek Gupta

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