जागरण टीम, आगरा। वीर सपूतों की कही जानी वाली चंबल की माटी की तासीर नहीं बदली है। इस मिट्टी ने कई बहादुर सैनिक दिए। बागियों के नाम से पहचान रखने वाले यहां के युवा आज देश सेवा के लिए जाने जाते हैं। यहां की आबोहवा में पले-बढ़े नौजवानों की रगों में देशभक्ति का लहू उबाल मारता है। चंबल नदी किनारे बसी बाह तहसील के गांवों ने भारत माता के वे सपूत दिये जिनके रक्त में प्रथम विश्व युद्ध से लेकर कारगिल तक दुश्मनों के छक्के छुड़ाए। कई के बलिदान के बाद इसी माटी के सैकड़ों जवान आज भी सरहद पर मोर्चा संभाले हुए हैं।

बाह से पांच किलोमीटर दूर भोपे का पुरा गांव है। यहां के बचन सिंह के सेना से सेवानिवृत्त होने से पहले ही बेटा शेर सिंह सेना में भर्ती हो गए। वर्ष 2006 में जम्मू कश्मीर के वनिहाल रामवन में आतंकियों से लोहा लिया। ताबड़तोड़ फायरिग में कई आतंकी मारे गए। देश की मिट्टी की खातिर शेर सिंह कुर्बान हो गए। उनका परिवार फिर भी नहीं घबराया। उनका बेटा दिवाकर सेना में देश की पहरेदारी कर रहा है। सिमराई गांव के इंद्रजीत सिंह 11 मई 2010 में जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में तीन आतंकियों को ढेर कर शहीद हुए थे। सेवानिवृत्त वायु सेना प्रमुख राकेश कुमार सिंह भदौरिया के गांव कोरथ का भी इतिहास शहीद के नाम से जाना जाता है। यहां के नायब सूबेदार लायक सिंह कारगिल जंग में शहीद हुए थे। हर युद्ध में लिया भाग

प्रथम विश्व युद्ध में बाह तहसील के 150 जवानों ने मोर्चा संभाला था। उसमें कल्याण सिंह, मदनलाल, जनक सिंह, मुलायम सिंह, मोहन सिंह, चंद्रका सिंह शहीद हो गए थे। 1939 से 1945 तक चले दूसरे विश्व युद्ध में 165 रणबांकुरों ने भाग लिया। महावीर सिंह समेत कई सैनिक शहीद हुए। शहीदों का गांव कहे जाने वाले रुदमुली के कैप्टन जगवीर सिंह ने बलिदान दिया। 1962 में चीन से हुए युद्ध में हवलदार रघुवीर सिंह शहीद हुए। पाकिस्तान से 1965 में हुई जंग में कैप्टन बृज राज सिंह शहीद हुए। 1971 के चीन युद्ध में रुदमुली के जसकरन सिंह, फतेहपुरा के राजबहादुर, क्यारी के महावीर सिंह शहीद हुए। आज भी तहसील क्षेत्र के दो हजार सैनिक भारतीय फौज में तैनात हैं और देश की रक्षा में लगे हुए हैं।

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