विपिन पारशर, आगरा: मुक्ति कहे गोपाल से, मेरी मुक्ति बताओ, ब्रज रज उड़ी मस्तक लगे, मुक्ति मुक्त हो जाय।। इन पंक्तियों में ब्रज का सार समाहित है। विदेशों से भी लोग ब्रज आते हैं। ब्रज रज ले जाते हैं। इस रज में श्री कृष्ण की गंध महसूस होती है। यमुना से जुड़ी बाल लीलाएं और कंस टीला पर संहार की लीला। गोवर्धन, बरसाना, नंदगाव सहित पूरे ब्रज में स्नेह और प्यार के न जाने कितने किस्से लोगों के जेहन में हैं, जिनमें कृष्ण के दर्शन होते हैं। यही ब्रजधाम है, जिसकी परिक्रमा को सबसे बड़ा पुण्य मानते हैं। पुराणों में भी ब्रज धाम को चारों धामों से निराला बताया गया है। अधिकमास के शुरू होने के साथ ही ब्रज धाम यानी 84 कोस की परिक्रमा शुरू हो गई है, जिसके प्रति आस्था का कोई अंत नहीं। इस माह में उन सारे उत्सवों की पुनरावृत्ति होती है जो पूरे साल आयोजित किए गए हैं। क्या होता है अधिकमास

ज्योतिष के अनुसार चंद्रगणना विधि से ही काल गणना की जाती है। चंद्रमा की 16 कलाओं को आधार मानकर दो पक्ष कृष्ण और शुक्ल का एक माह माना जाता है। कृष्ण पक्ष के पहले दिन से पूर्णिमा की अवधि तक साढ़े 29 दिन होते है। इस तरह एक साल में 354 दिन होते है और पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा 365 दिन छह घटे में करती है। जिसके कारण चंद्र गणना के हिसाब से 11 दिन तीन घड़ी और 48 पल का अंतर हर साल पड़ जाता है। फिर यही अंतर तीन साल में बढ़ते बढ़ते लगभग एक साल का हो जाता है। इसे ही दूर करने के लिए तीन वर्ष में एक बार अधिकमास की परंपरा रखी गई। अधिकमास के दोनों ही पक्षों में संक्रांति नहीं होती। इस बार ज्येष्ठ अधिकमास 16 मई से 13 जून, 2018 तक रहेगा। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस महीने भागवत श्रवण, दर्शन, दान-पुण्य, परिक्रमा का विशेष महत्व है।

सालभर के उत्सव होंगे एक माह में

ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा पुरुषोत्तम मास को भगवान का महीना माना गया है। इस महीने ब्रज के मंदिरों में सालभर के पर्व-उत्सव मनाए जाएंगे तो धर्म-कर्म करने का भी विशेष महत्व इस महीने में है। इस महीने चौरासी कोस परिक्रमा का भी विशेष महत्व है। इस परिक्रमा का उल्लेख पुराणों में भी है। ब्रजभूमि की ये पौराणिक यात्रा हजारों साल पहले शुरू हुई। चालीस दिन में पूरी होने वाली इस परिक्रमा का उल्लेख वेद-पुराण में भी है। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से ही नहीं सतयुग में भक्त ध्रुव ने यहा आकर नारदजी से गुरुमंत्र लेकर अखंड तपस्या व ब्रज परिक्रमा का उल्लेख मिलता है। तो त्रेता युग में भगवान श्रीराम के लघु भ्राता शत्रुघ्न ने मधु पुत्र लवणासुर का वध कर ब्रज परिक्रमा की। गली बारी के शत्रुघ्न मंदिर ब्रज यात्रा का पड़ाव है। द्वापर में उद्धवजी ने गोपियों संग ब्रज परिक्रमा की, तो 15 वीं शताब्दी में माधव संप्रदाय के आचार्य मधवेंद्रपुरी की यात्रा का भी वर्णन मिलता है। 16 वीं शताब्दी में महाप्रभु बल्लभाचार्य, गोस्वामी विट्ठलनाथ, चैतन्य महाप्रभु, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, नारायण भट्ट, निम्बार्क संप्रदाय के चतुरानागा आदि ने भी ब्रज चौरासीकोस की परिक्रमा कीं। ये है चौरासीकोस परिक्रमा के पड़ाव

ब्रज की परिधि यानी चौरासी कोस में करीब 35 पड़ाव है। मथुरा से चलकर यात्रा सबसे पहले भक्त ध्रुव की तपोस्थली ध्रुवघाट स्थित मंदिर से शुरू होकर मधुवन पहुंचती है। यहा से तालवन, कुमुदवन, शातनु कुण्ड, सतोहा, बहुलावन, राधा-कृष्ण कुण्ड, गोवर्धन, काम्यक वन, संच्दर सरोवर, जतीपुरा, डीग का लक्ष्मण मंदिर, साक्षी गोपाल मंदिर, जल महल, कमोद वन, चरन पहाड़ी कुण्ड, काम्यवन, बरसाना, नंदगाव, जावट, कोकिलावन, कोसी, शेरगढ, चीर घाट, नौहझील, श्री भद्रवन, भाडीरवन, बेलवन, राया वन, गोपाल कुण्ड, कबीर कुण्ड, भोयी कुण्ड, ग्राम पडरारी के वनखंडी में शिव मंदिर, दाऊजी, महावन, ब्रह्माड घाट, चिंताहरण महादेव, गोकुल, लोहवन से होकर वृंदावन मार्ग में अनेक पौराणिक स्थलों के दर्शन चौरासीकोस यात्रा में होते हैं। यात्रा में 33 स्थल रास लीला के तो हैं हीं, इनके अलावा कृष्णकालीन अन्य स्थल भी हैं। चौरासी कोस यात्रा मार्ग मथुरा के अलावा अलीगढ़, भरतपुर, गुड़गाव, फरीदाबाद की सीमा तक में पड़ता है, लेकिन इसका अस्सी फीसदी हिस्सा मथुरा में है।

यहा होंगे सालभर के आयोजन

वृंदावन के राधाबल्लभ, राधादामोदर मंदिर समेत सप्तदेवालयों में सालभर आयोजित होने वाले उत्सव और पर्व जैसे होली, दीवाली, हरियाली तीज, अक्षय तृतीया, चंदनयात्रा व विशेषकर नृसिंह जयंती महोत्सव का आयोजन तिथि के अनुसार एक ही महीने में किया जाएगा।

बरसाना में होगी होली

अधिकमास में बरसाना के श्रीजी मंदिर में भी पूरे साल के पर्व-उत्सव मनाए जाएंगे। होली का पर्व यहा बड़े स्तर पर होता है। जो अधिकमास में भी उल्लास पूर्वक मनाया जाएगा। ये प्रतीकात्मक ही होगा, समाज गायन में भी होली के पदों का गायन किया जाएगा।

नृसिंह जयंती का विशेष महत्व

डॉ. राजेश शर्मा के अनुसार उल्लेख है कि भगवान नृसिंह का प्राकट्य अधिक मास में हुआ था। यही कारण है कि इस महीने हर मंदिर, मठ में नृसिंह जयंती उल्लास पूर्वक मनाई जाती है।

इसलिए विशेष है गिरिराज परिक्रमा

चूंकि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गिर्राज गोवर्धन की पूजा की थी और द्वापर में गोवर्धन पूजा के समय एक स्वरूप से गिर्राज गोवर्धन में प्रवेश कर गए थे इसके कारण गोवर्धन को साक्षात श्रीकृष्ण भी माना जाता है। इसलिए इसकी परिक्रमा करने की होड़ लग जाती है। पुरूषोत्तम मास के स्वामी स्वयं पुरूषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण है। अधिक मास के शास्त्रों में उल्लेख करते हुए पंडित श्रीराम शास्त्री ने कहा कि अपनी उपेक्षा से दु:खी मलमास जब भगवान विष्णु के पास पहुंचा तो वे उसे भगवान श्रीकृष्ण के पास ले गए और उनसे उसे स्वीकार करने का अनुरोध किया। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे स्वीकार करते हुए कहा कि उनके सभी गुण, कीर्ति, अनुभव, छह ऐश्वर्य, पराक्रम एवं भक्तों को वरदान देने की शक्ति इस मास में भी आ जाएगी और यह पुरूषोत्तम मास के नाम से मशहूर होगा। यही कारण है कि जिस गिरिराज पर्वत को भगवान ने खुद पूजा उसकी परिक्रमा करने से विशेष फल मिलता है।

By Jagran