आगरा, राजीव शर्मा। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने 70 वर्षीय हरद्वार दुबे को राज्यसभा सदस्य के चुनाव का प्रत्याशी बनाकर एक बार फिर संदेश दे दिया है कि प्रत्याशी के लिए उम्र का बंधन नहीं, पार्टी से संबंध जरूरी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से शुरुआत करने वाले हरद्वार दुबे हर परिस्थति में भाजपा से जुड़े रहे। इसी का परिणाम है कि किसी भी चुनाव के लिए प्रत्याशी के चयन में उम्र पर विचार करने वाले संगठन ने दुबे की उम्र को नजरअंदाज कर दिया। दुबे आज राज्यसभा सदस्य के चुनाव के लिए नामांकन करेंगे।

यह पहला मौका नहीं है, जब भाजपा ने अपने किसी कार्यकर्ता को उसकी वफादारी का इनाम दिया हो। पूर्व मेयर बेबीरानी मौर्य भी इसका उदाहरण हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा के चुनावी मैदान में उतरने के लिए वह जोरशोर से दावेदारी कर रही थीं। ग्रामीण और छावनी विधानसभा सीट से टिकट मांग रही थीं लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दी। सालों से सक्रिय राजनीति में रहने के बावजूद जब उन्हें टिकट नहीं मिली, तब उन्हें झटका लगा। चुनाव लड़ने की उनकी इतनी तैयारी थी कि टिकट न मिलने पर भी उन्होंने नामांकन पत्र ले लिया था। मगर, संगठन के कुछ नेताओं के समझाने के बाद उन्होंने चुनाव न लड़ने का फैसला लिया। चुनाव हुआ, प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और कुछ महीने बाद बेबीरानी मौर्य छुट्टियां बिताने के लिए अमेरिका में अपने बेटे के पास चली गईं। तभी अचानक उन्हें सूचना मिली कि उन्हें उत्तराखंड का राज्यपाल बना दिया गया है। आनन-फानन में वह अमेरिका से लौंटी। हालांकि तब राज्यपाल बनने के लिए भाजपा के कई कद्​दावर व वरिष्ठ नेता दावेदारी कर रहे थे। मगर, अधिकांश में कुछ न कुछ डेंट लगा हुआ था। कोई कुछ महीनों के लिए तो कोई कुछ सालों के लिए सत्ता की लहर में दूसरे दलों से जुड़ गए थे। बाद में भाजपा की लहर दिखी तो वह भाजपा में आ गए। उन्होंने भाजपा से वफादारी के लाख दावे किए लेकिन संगठन के नेतृत्वकर्ताओं को वह संतुष्ट नहीं कर पाए और दौड़ में पीछे रह गए और बेबीरानी मौर्य ने बाजी मार ली। हरद्वार दुबे के मामले में भी ऐसा ही रहा। प्रदेश में सत्ता आती-जाती रहीं लेकिन उन्होंने भी संगठन का साथ कभी नहीं छोड़ा। उत्तर विधानसभा सीट पर वर्ष 2019 में हुए उपचुनाव में पुरुषाेत्तम खंडेलवाल को प्रत्याशी बनाकर भी पार्टी ने यही संदेश दिया था कि पार्टी में आस्था रखने वाले की कभी भी लाटरी लग सकती है। 

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